राज्य आन्दोलन में निष्क्रीय रहे लोग राज्य अवधारणा का मजाक उडा रहे हैं
पुरुषोत्तम असनोड़ा
राज्य की काबिना मंत्री इन्दिरा हृदयेश का देहरादून को ही राजधानी बनाने का बयान राज्य अवधारणा से मेल नही खाता है। 40 साल के विधायी जीवन का दावा करने वाली इंदिरा हृदयेश का उत्तराखण्ड राज्य गठन में कोई योगदान हमारी अल्प बुद्धि में तो नही आ रहा है। हां वे राज्य गठन से दो-ढाई दशक पहले से उप्र की विधान परिषद् में उत्तराखण्ड के शिक्षक निर्वाचन से विधान परिषद् की माननीय सदस्य रही और उत्तराखण्ड राज्य अवधारणाओं और राज्य आन्दोलन के ज्वार में उन जैसे कई माननीयों के योगदान कम से कम हमारी स्मृति में नहीं हैं।
राज्य गठन के बाद सत्ता किन लोगों के हाथ गयी यह सभी को विदित है। जो लोग उत्तराखण्ड राज्य के समर्थक ही न रहे हों भला उनसे राज्य अवधारणाओं और शहीदों के स्वप्नों, आन्दोलन की भावना की बात कोई मायने नही रखती। 9 नवम्बर 15 को जब उत्तराखण्ड राज्य स्थापना की 15वीं वर्षगांठ मनाई जा रही थी उनका यह बयान शहीदों की शहादत को झुठलाने जैसा है। जो रही हो ंआशा-अपेक्षा, सपने हम वही करेंगे जो हमें ठीक लगेगा।
ठीक है जब सत्ता आपको दी है तो माई बाप तो आप ही हैं ना, जो करेंगे जैसा करेंगे सिर झुकाकर स्वीकार करने के अलावा क्या चारा है? गैरसैंण विधान सभा सत्र दो दिन में क्यों समाप्त हो गया उसकी परतें लगातार खुलने लगी हैं। विधान सभा अध्यक्ष ने कहा- संसद का एपीसोड दोहराने की मंशा विपक्ष की थी। ये तो विपक्ष का हाल था जो गैरसैंण राजधानी पर नियम 310 पर चर्चा चाहता था। सरकार में एक संसदीय कार्य मंत्रालय है और उसकी भारी भरकम मंत्री भी। जब राष्ट्रपति ने कहा विधान सभा कम से कम 100 दिन तो चलनी ही चाहिए आप सब क्यों ताली बजा रहे थे। आपको नही मानना था तो कहते महामहिम आपकी सलाह हमें नही पचती। दो दिन का सत्र कितना मजाक है जनता को छलने और संसाधनों के दुरुपयोग का। संसदीय कार्यमंत्री क्यों रास्ता निकालती, उन्हें गैरसैंण आने में ही परेशानी होती है।
म्ंाशा नही है तो अच्छा है लोग समझे तो हैं, देहरादून का मोह उन सब लोगों को है जो उत्तराखण्ड के दुश्मन थे, कहीं उधमसिंह नगर बचाओ आन्दोलन चला रहे थे तो कोई लखनऊ- दिल्ली की आलीशान कोठियों में आन्दोलन को विफल करने की रणनीति बना रहे थे अथवा कामना कर रहे थे। उत्तराखण्ड के गांधी इन्द्रमणी बडोनी पर पत्थर मारने और मुजफ्फर नगर कांड के अनंतकुमार व बुआसिंह को प्रमोशन देने वाले लोग उत्तराखण्ड के मित्र तो नही हैं। सवाल केवल राजधानी का नहीं है जिस जल-जंगल-जमीन को लेकर औपनिवेशिक सत्ता से लेकर स्वतंत्र भारत की सरकारों से हम लडते रहे उनकी रक्षा का सवाल है, पहाड के गांव अपने राज्य निर्माण के बाद खाली हो गये इससे बडा विनाश क्या होगा?आपदा का विनाश झेले गांवों के लिए जमीन नही है नेकिन जिन्दल के इण्टर नेशनल स्कूल के लिए बिना देरी के भूमि हाजिर है। जिन लोगों के लिए खटीमा, मसूरी, मुजफ्फर नगर या श्रीयंत्र टापू कांड केवल घडियाली आंसू बहाने के निमित बन जायें वे अपनी लाश पर ही तो उत्तराखण्ड बनवायेंगे और मुख्यमंत्री बन उसकी छाती में मुंग दलेंगे। वही लोग जो शिक्षकों का वोट पा विधान परिषद् में एकछत्र राज कर रहे थे राज्य गठन के बाद शिक्षा में कुछ अभिनव करने के बजाय पी डब्लू डी जैसा मलाईदार विभाग ले बैंठते हैं।
उत्तराखण्ड उन टुच्चों की जागीर बनने दी गयी यह हमारी असफलता है। राज्य आन्दोलन में दिन रात एक करने के बावजूद हम राज्य निर्माण के काम से पीछे हट गये। और वे लोग आगे हो गये जिनको राज्य अवधारणाओं, शहीदों के स्व्प्नों और जन अपेक्षाओं से कुछ लेना-देना नही है। सन्1994 का ज्वार अचानक नही आया था। वर्षों से हो रही उपेक्षा और लूट के खिलाफ लोग राज्य से कुछ कम नही के साथ सडकों पर उतर आये थे। आज जब जनता खडी होगी तो लुटेरों के भागने के रास्ते बन्द हो चुके होंगे। इसलिए किसी को भी राज्य अवधारणओं की अनदेखी पर दस बार सोच लेना चाहिए।
पुरुषोत्तम असनोड़ा
राज्य की काबिना मंत्री इन्दिरा हृदयेश का देहरादून को ही राजधानी बनाने का बयान राज्य अवधारणा से मेल नही खाता है। 40 साल के विधायी जीवन का दावा करने वाली इंदिरा हृदयेश का उत्तराखण्ड राज्य गठन में कोई योगदान हमारी अल्प बुद्धि में तो नही आ रहा है। हां वे राज्य गठन से दो-ढाई दशक पहले से उप्र की विधान परिषद् में उत्तराखण्ड के शिक्षक निर्वाचन से विधान परिषद् की माननीय सदस्य रही और उत्तराखण्ड राज्य अवधारणाओं और राज्य आन्दोलन के ज्वार में उन जैसे कई माननीयों के योगदान कम से कम हमारी स्मृति में नहीं हैं।
राज्य गठन के बाद सत्ता किन लोगों के हाथ गयी यह सभी को विदित है। जो लोग उत्तराखण्ड राज्य के समर्थक ही न रहे हों भला उनसे राज्य अवधारणाओं और शहीदों के स्वप्नों, आन्दोलन की भावना की बात कोई मायने नही रखती। 9 नवम्बर 15 को जब उत्तराखण्ड राज्य स्थापना की 15वीं वर्षगांठ मनाई जा रही थी उनका यह बयान शहीदों की शहादत को झुठलाने जैसा है। जो रही हो ंआशा-अपेक्षा, सपने हम वही करेंगे जो हमें ठीक लगेगा।
ठीक है जब सत्ता आपको दी है तो माई बाप तो आप ही हैं ना, जो करेंगे जैसा करेंगे सिर झुकाकर स्वीकार करने के अलावा क्या चारा है? गैरसैंण विधान सभा सत्र दो दिन में क्यों समाप्त हो गया उसकी परतें लगातार खुलने लगी हैं। विधान सभा अध्यक्ष ने कहा- संसद का एपीसोड दोहराने की मंशा विपक्ष की थी। ये तो विपक्ष का हाल था जो गैरसैंण राजधानी पर नियम 310 पर चर्चा चाहता था। सरकार में एक संसदीय कार्य मंत्रालय है और उसकी भारी भरकम मंत्री भी। जब राष्ट्रपति ने कहा विधान सभा कम से कम 100 दिन तो चलनी ही चाहिए आप सब क्यों ताली बजा रहे थे। आपको नही मानना था तो कहते महामहिम आपकी सलाह हमें नही पचती। दो दिन का सत्र कितना मजाक है जनता को छलने और संसाधनों के दुरुपयोग का। संसदीय कार्यमंत्री क्यों रास्ता निकालती, उन्हें गैरसैंण आने में ही परेशानी होती है।
म्ंाशा नही है तो अच्छा है लोग समझे तो हैं, देहरादून का मोह उन सब लोगों को है जो उत्तराखण्ड के दुश्मन थे, कहीं उधमसिंह नगर बचाओ आन्दोलन चला रहे थे तो कोई लखनऊ- दिल्ली की आलीशान कोठियों में आन्दोलन को विफल करने की रणनीति बना रहे थे अथवा कामना कर रहे थे। उत्तराखण्ड के गांधी इन्द्रमणी बडोनी पर पत्थर मारने और मुजफ्फर नगर कांड के अनंतकुमार व बुआसिंह को प्रमोशन देने वाले लोग उत्तराखण्ड के मित्र तो नही हैं। सवाल केवल राजधानी का नहीं है जिस जल-जंगल-जमीन को लेकर औपनिवेशिक सत्ता से लेकर स्वतंत्र भारत की सरकारों से हम लडते रहे उनकी रक्षा का सवाल है, पहाड के गांव अपने राज्य निर्माण के बाद खाली हो गये इससे बडा विनाश क्या होगा?आपदा का विनाश झेले गांवों के लिए जमीन नही है नेकिन जिन्दल के इण्टर नेशनल स्कूल के लिए बिना देरी के भूमि हाजिर है। जिन लोगों के लिए खटीमा, मसूरी, मुजफ्फर नगर या श्रीयंत्र टापू कांड केवल घडियाली आंसू बहाने के निमित बन जायें वे अपनी लाश पर ही तो उत्तराखण्ड बनवायेंगे और मुख्यमंत्री बन उसकी छाती में मुंग दलेंगे। वही लोग जो शिक्षकों का वोट पा विधान परिषद् में एकछत्र राज कर रहे थे राज्य गठन के बाद शिक्षा में कुछ अभिनव करने के बजाय पी डब्लू डी जैसा मलाईदार विभाग ले बैंठते हैं।
उत्तराखण्ड उन टुच्चों की जागीर बनने दी गयी यह हमारी असफलता है। राज्य आन्दोलन में दिन रात एक करने के बावजूद हम राज्य निर्माण के काम से पीछे हट गये। और वे लोग आगे हो गये जिनको राज्य अवधारणाओं, शहीदों के स्व्प्नों और जन अपेक्षाओं से कुछ लेना-देना नही है। सन्1994 का ज्वार अचानक नही आया था। वर्षों से हो रही उपेक्षा और लूट के खिलाफ लोग राज्य से कुछ कम नही के साथ सडकों पर उतर आये थे। आज जब जनता खडी होगी तो लुटेरों के भागने के रास्ते बन्द हो चुके होंगे। इसलिए किसी को भी राज्य अवधारणओं की अनदेखी पर दस बार सोच लेना चाहिए।
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