सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

चकबन्दी दिवस कार्यक्रम कल, आज निकली रंग यात्रा कृषि मंत्री हरकसिंह रावत हैं मुख्य अतिथि



   गैरसैंण, 29 फरवरी, झमाझम वर्षा के बीच चकबन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर निकली रंगयात्रा चकन्दी के नारों जनगीतों और स्लोगन की तख्तियों के साथ गैरसैंण की सडकों पर एक बार आन्दोलन की यादें ताजा कर गयी।
  गरीब क्रांति अभियान द्वारा चकबन्दी आन्दोलन की पुरोधा गणेशसिंह गरीब के जन्म दिवस पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में कुषि मंत्री डा हरकसिंह रावत, विधान सभा उपाध्यक्ष डा अनुसूया प्रसाद मैखुरी,चकबन्दी सलाहकार अध्यक्ष केदारसिंह रावत और स्वयं गणेशसिंह गरीब शिरकत कर रहे हैं।
   रामलीला मैदान में वीर चन्द्रसिंह गढवाली की मूर्ति के सामने से शुरु हुई रंग यात्रा में ‘ले मशालें चल पडे हैं लोग मेरे गांव के,‘ जनगीत, खेतों की दूरी मिटानी है- चकबन्दी जरुरी है, पहाड बचाने हैं-चकबन्दी लानी है आदि नारों के साथ चकबन्दी के स्लोगन की लिए कार्यकर्ताओं ने रंगयात्रा निकाली जो चैराहा, डाक बंगला रोड, तहसील कार्यालय, वीर चन्द्रसिंह गढवाली मार्ग होत हुए रामलीला मैदान में समाप्त हुई।
  रंगयात्रा में गरीब क्रांति अभियान संयोजक कपिल डोभाल, ललित कोठियाल, बी मोहन नेगी, संजय बुढाकोटी, अमित गुसांई, विकास ध्यानी, डी के तिवारी, मैती आन्दोलन के कल्याणसिंह रावत, अनूप नेगी, तन्नू पंत, चतुरसिंह नेगी, अनूप पटवाल, गजेन्द्र नौटियाल, कुलदीप नेगी, पुरुषोत्तम असनोड़ा आदि ने शिरकत की।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

मुस्कराइये! कि आप डेढ लखिया हो गये, मलेथा और नैनीसार की बात जेल भेजेगी


पुरुषोत्तम असनोड़ा
   उत्तराखण्ड में प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय एक लाख चैवन हजार आठ सौ अठ्ठारह रु अनुमान है जो गत वर्ष की 139184रु से 7.6 प्रतिशत अधिक है। 7.65 प्रतिशत विकास दर ंसे राष्ट्रीय औसत के लगभग है जबकि प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से राष्ट्रीय औसत 93231रु है। अर्थ एवं संख्या निदेशालय के आंकडे 2011-12 से लगातार बढोतरी प्रदर्शित कर रहे हैं। 2011-12 में उत्तराखण्ड की प्रति व्यक्ति औसत आय 85372रु थी।
  आय में यह वृद्धि तब छठें वेतनमान से राज्य कर्मियों और शिक्षकों को हुए लाभ का कारण बताया गया था। सातवें बेतन आयोग लागू होने के बाद अगले वर्ष यह व्द्धि और और आगे जायेगी। अंाकडे तो आंकडे हैं कृषि विकास दर 3.09 प्रतिशत की वृद्धि बताती है कि उनकी सच्चाई क्या है? गांव खली हुए खेत बंजर हो गये, जंगली जानवरों का आतंक बढ गया, मैदानों में पहाड के पलायन का असर वहां की कृषि भूमि में रिहायशी मकान बनने से सिकुडाहाट हुई, और विकास दर बढ गयी?
  सडक, बिजली, पानी,यातायात, शिक्षा, चिकित्सा कार्यालयों के काम काज पर आय वृद्धि का असर क्यों नही दिख रहा है? 338 गांवों जो के दौर से  रहने के योग्य नही रहे हैं और विस्थापन व पुनर्वास की आवश्यकता के लिए धन और भूमि मुहैया नही हो रही है। सरकारी आंकडे पहाडी जिलों डेढ लाख घरों में ताले लटके होने की बात स्वीकार रहे हैं।  सडकों की हालत एक दशक पहले जो थी वह नही सुधरी है। शिक्षा में कई प्रयोगों के बावजूद सरकारी विद्यालय इसलिए बन्द हो रहे हैं कि वहीं छात्र नहीं हैं। चिकित्सालयों में डाक्टरों को ला पाना तो दूर सरकार खुद कहती है चिकित्सक पहाड नही चढना चाहते। रोज नई घोषणाऐं और फिर धनाभाव का रोना, अजब- गजब का प्रदश हो गया है उत्तराखण्ड। 
       विकास और शिक्षा की कहानी नैनीसार से शुरु हो गयी जिन्हें विकास और शिक्षा चाहिए वे जिन्दल जैसे माफिया को जमीन देने पर एतराज न करें जो  करेंगे वे विकास व शिक्षा के विरोधी हैं। माधोसिंह मलेठा की कर्म भूमि में क्रेसर लगाने वाले उत्तराखण्ड की अर्थ व्यवस्था के मित्र हैं और जो मलेथा की उपजाऊ भूमि जिसके लिए वीर माधोसिंह ने अपने पुत्र की बलि दे दी थी को बंजर बनने से बचाने वालों को जेल ठूंस दो। मुख्य मंत्री द्वारा प्रारम्भ की गयी यात्रा रुकने वाली नही है जो उन्होंने हलद्वानी में कह दिया है।
 निर्जन गांव की आखिर कहानी है क्या? वही विकास, वही शिक्षा-चिकित्सा, सडक, पानी, बिजली और रोजगार। उत्तराखण्ड के जिन घरों में ताले लगे उन्हें अपने घर बन्द करने का शौक नही रहा होगा। अभी गांव की जमीन पर माफिया बिठा दो, कल उन घरों में, अगले दिन देश की सीमा के गांवों में विदेशी बसाओ और किस्सा खत्म। सब निर्जन हो रहा है इसलिए किसी को विकास, किसी को शिक्षा, किसी को रोजगार और जो बचे उसे गुण्डागर्दी के लिए ही सही दे दो उत्तराखण्ड की जमीन, हवा-पानी। दे भी दिया है जल विद्युत परियोजनाऐं ने लूट तो लिए हैं संसाधन।
शायद उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के 15 सालों में जनता ने खुश रहने का प्रयास नही किया। जनता जल विद्युत योजनाओं की खिलाफत करते रहे और लूटने और लुटवाने में मसगूल रहे।
जनता पिटती रही और वे पीटते रहे। उन्हें खनन-शराब से आ रही  अकूत संम्पदा की फिक्र थी और जनता को उसे बचाने की। जब रास्ते अलग थे टकराव कीं न कही होना थ। वह मलेथा या नैनीसार कहीं भी हो सकता था। सत्ता पहले ही दहाड रही थी- खाता न वही हम ही सही, अब तो आंकडे भी हैं- सबको डेढ लखिया बना दिया अब भी रोते हो रोओ। हम तो अपनी मन की करेंगे ही, चाहे उत्तराखण्ड जिसके हाथ बिक जाये। 
     

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज अस्वस्थ, कोटेश्वर आश्रम में हो रहा है उपचार


 बदिराश्रम ज्योतिर्पीठ के शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम जी महाराज अस्वस्थ हैं और रुद्र प्रयाग के कोटेश्वर महादेव गाभ्म में उपचार चल रहा है।
  73 वर्षीय विद्वान संत, धर्म के मर्मज्ञ और बदरीकाश्रम ज्योतिर्पीठाधीश्वर माधवाश्रम जी महाराज वेद, धर्म के विद्वान होने के साथ ही जनसरोकारों से जुडे संत हैं।
  उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन, शराबबन्दी आनदोलन और गैरसैंण राजधानी आन्दोलन में प्रत्यक्ष भाागीदारी करते रहे हैं। पिछले दिनों बे्रन हैमरेज के चलते उन्हें पीजीआई चंडीगढ में उपचार दिया गया था, जहां से महाराज जी ने कोटेश्वर आश्रम आने की इच्छा जताई थी।
  महाराज के शिष्य वशिष्ठ जी ने बताया कि महाराज के स्वास्थ में सुधार है और आश्रम में ही चिकित्सक उन्हें पी जीआई के निर्देशों के अनुसार उपचार दे रहै। श्रद्धालु शंकराचार्य महाराज के दर्शनों के लिए बडी संख्या में रोज वहां पहुंच कर स्वास्थ्य लाभ हेतु प्रार्थना कर रहे हैं।
  गैरसैंण से उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी पुरुषोत्तम असनोड़ा, यायावर स्मृति समिति महासचिव डा सी एस भण्डारी व जयसिंह नेगी ने  कोटेश्वर आश्रम में शंकराचार्य महाराज के दर्शन किए और भगवान शंकर से उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना की। 



गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

ओफ! इस गुण्डई की हद है, हवा भी पूछेगी मेरी फिंजा में जहर किसने घोला रौतज्यू!


         नैनीसार में जिन्दल नामक जिस भ्ास्‍मासुर को हरीश रावत उठा कर लाये हैं वह उत्तराखण्ड को तो तबाह करेगा ही , स्वयं हरीश रावत के लिए भी भस्मासुर शावित होगा। नैनीसार में भूमि आवंटन से लेकर उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पी सी तिवारी पर हमला तक और राष्ट्रीय तिरंगे के अपमान से लेकर माओवादी गतिविधियों तक सब कुछ उत्तराखण्ड और कांग्रेस की हरीश रावत सरकार के असफलता के लक्षणहैं।
        सच में तो उत्तराखण्ड उस दिन सुलग जाना चाहिए था जब जिन्दल के गुण्डों ने उत्तराखण्ड के एक प्रखर आन्दोलनकारी पर हाथ उठाया।  फिर उस दिन दिन सुलगता जब स्वतंत्रता सेनानी द्वारा फहराये राष्ट्रीय तिरंगे को उतारने का देशद्रोह हुआ। जिस जिदल की कंटीली चार दिवारी में करंट हो और कोई उसे फांदे जिन्दल के लोग उसे न देखें , ऐसा हो कैसे गया? अपने पाप छुपाने को क्या-क्या तरीके ये लोग अपनायेंगे नही कह सकते?
      रावत साहब! आपसे विनती है उत्तराखण्ड की फिंजा खराब न करें। आप अपने 45-50 साल के उत्तराखण्ड की राजनीति का बार-बार हवाला देते हैं। हम लोग कम से कम 40 साल उत्तराखण्ड के सामाजिक कार्यकर्ता आन्दोलनकारी के रुप में काम कर रहे हैं और हमें भी आपकी राजनीति की जानकारी कुछ न कुछ तो जानकारी रही होगी। आप राजनीति में पाने के लिए आयें हैं, हमने लोगों प्लस-माइनस का कभी ध्यान नही किया। आप अपने को राज्य आन्दोलन से जुडा व्यक्ति कहते हैं, हम आपके राज्य आन्दोलन की भूमिका भी जानते हैं।
      संडे पोस्ट के संपादक अपूर्व जोशी को आपने जो पत्र लिखा है उसमें अपनी गांव की सडक का भी जिक्र है। आप बतायेंगे कि दुभणा बैंड- चमडखान की 3 किमी सडक आपके गांव क्यों गयी? ताडीखेत के पूर्व प्रमुख जीवनसिंह रावत से पूछिए जो दुभणा बैंड- चमडखान के 3 किमी मोटर मार्ग के जी ओ के साक्षी हैं। चूंकि आप सांसद बनते ही सडक अपने गांव ले आये और वह सडक आज तक नही बनी।
  उत्तराखण्ड देवभूमि है और यहां गुण्डों की जरुरत नही है। आप अपने बुढापे में तब मोहनरी सकून रह सकेंगे जब गुण्डे नही होंगे, अन्यथा बुढापा खराब समझिए। जिन्दल के गुण्डों से उत्तराखण्ड का वातावरण खराब मत करिए।  अन्यथा गाड-गधेरे ही नहीं हवा भी पूछेगी- मेरी फिंजा  में जहर किसने घोला रौत ज्यू!      

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016





स्व डा उमाशंकर व भवानीशंकर की पहली पुण्य तिथि
जनपक्षीय पत्रकारिता की चुनौती पर गोष्ठी- सिमट रही जनपक्षीय पत्रकारिता पर जाहिर हुई चिन्ता
भवानी शंकर की प्रतिबद्धता मूल्यों के विकास की पत्रकारिता थी
   रीजनल रिपोर्टर के संपादक द्वय स्व डा उमाशकर थपलियाल व भवानी शंकर  थपलियाल की पहली पुण्य तिथि पर हेमवती नन्दन बहुगुणा केन्द्रीय विश्व विद्यालय बिडला परिसर सभागार में आयेजित विचार गोष्ठी में उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया गया।
   भवानी शंकर स्मृति गु्रप की ओर से आयोजित कार्यक्रम में जनपक्षीय पत्रकसरिता की चुनौती पर बोते हुए मुख्य वक्ता वरिष्ठ स्तंभकार डा भरत झुनझुन ने कहा-वौलिटियरी पावट्र्री के बिना जनपक्ष मजबूत नहीं होगा । उन्होंने कहा-मनु स्मृति का ब्राह्मण, लेनिन की पार्टी कैडर और गांधी जी का लोकसेवक  जनता से की शक्ति थी। डा झाुनझुनवाला ने कहा- हम जनपक्ष सोच लें कोई हमें डिगा नही सकता।
  एनडीटीवी के सुशील बहुगुणा ने कहा-पत्रकारिता के लिए जिस सोचा और समझा की जरुरत होती है वह कम होती जा रही है। हम सत्ता या आम जन में किसके पक्षधर हों ये महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा- विाषम स्थितियों, साधनों की नितान्त कमी के बावजूद भवानी ने रीजनल रीपोर्टर को जो धार दी वह जनपक्षीय पत्रकारिता की मिशाल है।
  नवभारत टाइम्स के चन्द्रभूषण ने पत्रकार के लिए जमीन और खाद की आवश्यकता बताते हुए कहा-आज की पत्रकारिता में जनपक्ष सिकुड रहा है। उन्होंने कहा- भवानी की जगह खाली है और उस जगह के लिए कई भवानी पैदा हो तभी वह पूर्ति हो सकेगी। उन्होंने पत्रकारिता को निजी विचार धारा से अलग कर वासत्विकता लोगों के बीच लाने की आवश्यकता बताई।
    डा एस पी सती ने डा उमाशंकर व भवानी शंकर को याद करते हुए कहा- पत्रकारिता के दो स्तंभों का एक साथ हमसे विदा होना दुखदायी है।ं रीजनल रिपोर्टर के संपादकीय सहयोगी गंगासिह ने कार्यवृत प्रस्तुत करते हुए रीजनल  रिपोर्टर के सरोकारों से साक्षत्कार की थीम बताई। इन्द्रेश मैखुरी के संचालन में हुए कार्यक्रम के  समापन अवसर पर डा अरुण कुकसाल ने रीजनल रीपोर्टर के वैचारिक और आर्थिक प़क्ष को सहयोग हेतु अपील की और पत्रिका दायित्व कुशलता से संभाल रही गंगा असनोड़ा थपलियाल की सराहना की।
  आयोजन टीम के सीताराम बहुगुणा, एल मोहन कोठियाल, डा डी आर पुरोहित, पूर्व पालिकाध्यक्ष कृष्णानन्द मैठानी, वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल, गणेश खुगशाल गणी, मधु झुनझुनवाला, डा सुरेखा डंगवाल, डा आर आर नौटियाल, सुधीर भट्ट, अनूप नौटियाल, प्रो ए आर डंगवाल, डा वी सी नैथानी, नीरज नैथानी, डा सी एस भण्डारी, डा बी डी कुकरेती, साहिबसिंह सजवाण, डा जे एस बिष्ट, अतुल सती, सीमा सती, अंजना भट्ट घिण्डियाल सीना उपाध्याय, रोशन नैलवाल, जगदीश भट्ट,  आदि बडी संख्या में लोग उपस्थित थे ।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

   17 फरवरी 2015 हमेशा दैविव्यमान रहने वाला सूरज काली रोशनी लेकर आयेगा कौन सोच सकता है। नाम से शंकर, घर का नाम शंकर, भगवान शंकर के उपासक और भगवान शंकर का ही दिन शिवरात्रि, हमारे अजीज भवानी शंकर व डाॅ उमाशंकर की चिरविदाई जिनसे श्रीनगर, उत्तराखण्ड और देश-विदेश के उनके परिजनों पर जो प्रतिघात हुआ उसकी आज पहली पुण्यतिथि है।
   डाॅ उमाशंकर थपलियाल पत्रकारिता, साहित्य, खेल और सामाजिक जीवन के वह स्तम्भ थे जिसकी रिक्तता हमेशा महसूस की जायेगी। रीजनल रिर्पोटर के प्रबन्ध सम्पादक, आकाशवाणी के सम्वाददाता, यूएनआई, हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स आॅफ इण्डिया, लोकमत, बिजनौर टाइम्स, देवभूमि सहित दर्जनों संस्थानों से जुडे रहे डाॅ थपलियाल पत्रकारिता के बडे स्तम्भ थे। साहित्य और संस्कृति के पुरोधा और सामाजिक जीवन के अभिन्न अंग हमारे अपने थे।
   रीजनल रिपोर्टर के युवा सम्पादक भवानी शंकर की प्रतिभा ज्ञान और सरोकारों को समझने की क्षमता हम सब से अधिक थी। श्रीनगर में रहते हुए देश दुनिया की खोज, अविष्कार, शिक्षा, राजनीति, इतिहास और भूगोल की जो जानकारी उनके पास होती थी वह शायद ही किसी के पास होती थी। हंसमुख, काम पर उलझे रहने वाले और स्वप्न दृष्टा भवानी का असमय जाना खलता है।
   इस एक साल में रीजनल रिपोर्टर की गुरूत्तर जिम्मेदारी बेटी गंगा व रीजनल रिपोर्टर के सम्पादकीय सहयोगी मित्रों, शुभचिन्तकों, परिजनों, पाठकों व विज्ञापनदाताओं ने जितनी तत्परता से सम्भाली है उन सब का स्नेह, आदर सम्पादक द्वय के प्रति प्रदर्शित होता है। अपने प्रिय भवानी व डाॅ उमाशंकर थपलियाल आप पितर श्रेणी में पंहुच गये हैं। आपकी व आपके द्वारा दिखाये गये मार्ग पर चलने के प्रयास की ही हामी भर सकते हैं।
   आपको श्रद्धासुमन! कोटी-कोटी नमन

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

मुख्यमंत्री जनसंवाद,पारदर्शिता और विकास जैसे जुमलों से जनता को गुमराह कर रहे हैं-प्रभात ध्यानी द्वाराहाट में उपपा कार्यकर्ताओं ने फूंका मुख्यमंत्री का पुतला

गैरसैंण,13 फरवरी
        उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी केन्द्रीय प्रधान महासचिव प्रभात ध्यानी सहित छः   उपपा व सहयोगी संगठन नेताओं को रामनगर में मुख्य मंत्री हरीश रावत के आने से पहले गिरफ्तार करने को उपपा ने सरकार की तानाशाही करार दिया है।  दिन में 1.20 बजे प्रभात ध्यानी केसर राणा, पंकज, ललिता रावत, मनमोहन अग्रवाल व मनीन्द्र सेठी को सी ओ स्वतंत्रकुमार व कोतवाल कैलाश पंवार ने गिरफ्तार कर लिया और शायं 5 बजे कालाढुंगी के एसडीएम अशोक जोशी ने उनकी रिहाई की।
        प्रभात ध्यानी ने बताया कि वे मुख्यमंत्री का विरोध करने की बात नही कर रहे थे बल्कि नैनीसार पर मुख्य मंत्री जो गलत बयानबाजी कर रहे हैं उसका जवाब जरुर लेना चाहते थे। उन्होंने कहा- एक ओर हरीश रावत जनसंवाद जैसा ढोंग कर रहे हैं दूसरी तरफ लोगों को अपनी बात कहने पर पुलिस बल का प्रयोग हो रहा है। जनसंवाद, पारदर्शिता और विकास जैसे जुमले बेकार हो गये हैं।
          उन्होंने कहा- नैनीसार से मुख्यमंत्री की पोल खुल गयी है जहां उन्होंने उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी  अध्यक्ष पर जानलेवा हमले के आरोपियों की गिरफ्तारी रोकने का काम किया है और उल्टे पी सी तिवारी की गिरफ्तारी करवाई है।
       उपपा प्रधान महासचिव ने कहा- जनता सरकार की कारगुजारियों को समझ गयी है इसलिए आज नैनीसार में उनके दायित्वधारियों को जनता के भारी विरोध का सामना करना पडा।
       प्रभात ध्यानी और साथियों की गिरफ्तारी की उत्तराखण्ड के कई स्थानों पर प्रतिक्रिया हूई है, द्वाराहाट में उपपा कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री का पुतला जलाया।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

धन्य हैं हम- मुलायम के भी अपराधी रहे और उत्तराखण्ड के विकास पुरुषों के भी

             उत्तराखण्ड विकास के सोपान चढ नही रहा बल्कि छलांग लगा रहा है, सुनकर अच्छा लगा कि राज्य देश के 10 समृद्ध राज्यों में शामिल है और उसकी विकास दर 13 प्रतिशत से अधिक है। किस किस को बधाई दें इस शानदार उपलब्धि पर समझ नही आ रहा है।
            राज्य के मुख्य मंत्री को तो देनी ही पडेगी। अब वे केन्द्र के सौतेले व्यवहार का रोना नही रोयेगे। विकसित प्रदेश का मुख्यमंत्री छोटी- छोटी सहायता के लिए केन्द्र के आगे हाथ पसारे भी क्यों? अब उन्हें बाजार से उधार भी नही लेना पडेगा क्योंकि विकसित हैं तो संसाधन भी होंगे।
              सबसे बडी बात उत्तराखण्ड की जमीनें माफिया को नही देनी पडेंगी, राज्य का खर्चा चलाने के लिए ही तो वे जिन्दल और उसके गुण्डों का बोझ बदनामी की हद तक झेल रहे थे। अब कर्मचारी शिक्षकों को 3 महिने से वेतन न मिलने की शिकायत नही होनी चाहिए। संविदाकर्मियों को 9 माह और अतिथि शिक्षकों को 6 माह से वेतन नही मिला तो क्या है? तीन महिने पहले सुना था राज्य कर्मियों की तनख्वाह के लिए बाजार से कर्ज लेना पडा है। विकसित राज्य में यह कर्ज और भी कई धन्नासेठ देने को तैयार होंगे। देश में धनखवीसों की कमी कहां है? बधाई तो उन नौकरशाहों को देनी पडेगी जो सरकारी बजट को सूंघने में माहिर हैं, जो आपदा के कफन पर भी हाथ साफ करने से नही चूके और भीषण आपदा के दिनों में चिकन कबाब की डकार ले रहे थे।
            उन महानुभावों को भी बधाई जिनके लिए नये पद सृजित करने पडे जो सरकार चाहे कोई हो सबके प्रिय रहे हों, राज्य को कैसे लूटा जा सकता है, हर फार्मूूला जानते हैं। राज्य की जनता को भी बधाई कि उसने उन पार्टियों पर भरोसा किया जो राज्य अवधारणा से भले ही लगातार दूरी बनायें लेकिन विकास का झंडा जिनके हाथ है। लाल पीली बत्तियों उनकी कृपा की मोहताज हैं। विकास और शिक्षा के  नाम पर अब उन्हें कोई हडकायेगा भी नही। विकसित प्रदेश के निवासियों की सडक ठीक हुए बिना 13 प्रतिशत विकास दर  हो ही नही सकती। सरकारी विद्याालय अब छात्र संख्या के कारण अब बन्द नही होंगे। विकास का गणित जोडते घटाते समय शिक्षा भी तो कही न कही होगी ना? अस्पतालों का पी पी पी मोड ही ठीक है। इण्टर नेशनल स्कूल ही क्यों प्राइमरी स्कूलों को बेच खाने की रीति नीति बन चुकी है, कुछ घपलेबाज हैं जो नैनीसार या मलेथा जैसे प्रकरण उठा देते हैं हल्ला करते हैं और सरकार जो बेच रही होती है उसमें बाधा डालते हैं। सरकार के पास पुलिस है प्रशासन है जेल है सब चलेगा, नीति और रीति बन गयी तो किसकी मजाल है जो टांग अडाये, उसके लिए तो गुण्डे हैं, बाउन्सर हैं नही तो एसडीएम, डीएम, कप्तान और कोतवाल हैं। इतने मुकदमे लगेंगे कि कानून की किताब को कई बार पढना पडेगा।
             धन्य है विकास, धन्य हैं विकास कार्यकर्ता उसके गुण्डे और बाउन्सर, हम तो धन्य धन्य हैं ही मुलायम के भी अपराधी रहे और उत्तराखण्ड  विकास महापुरुषों के भी।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

जैंता इक दिन त आलौ उ दिन य दूनी में, दलाल की दिन पूरे होनेें को है


पुरुषोत्तम असनोड़ां
      अल्मोडा जिला का डीडा नैनीसार  6 महिने पहले तक एक मालूम सा गांव-तोक रातों-रात देश- दुनिया में मसहूर हो गया। अनजान से गांव की जमीन पर माफिया की नजर पडी और सरकार ने युद्ध स्तर पर उसे जिन्दल ग्रुप के हिमांशु इण्टर नेशनल स्कूल के नाम आवंटित कर दिया। 
  सैया भये कोतवाल तो डर काहे का, की तर्ज पर बिना लीज पट्टे के 22 अक्टूबर 15 को मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जन विरोध के बावजूद हिंमांशु इण्टरनेशनल स्कूल का उद्घाटन कर दिया। नैनीसार के ग्रामीणों व उत्तराखण्ड परिवर्तंन पार्टी ने भूमि आवंटन का विरोध करते हुए आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। स्कूल में मुख्य मंत्री के इन्वाॅलमेंट ने प्रशासन को इतना पक्षपाती बना दिया कि उसने भूमि के कब्जे में स्कूल को पूरी छूट दे दी । यहां तक कि कानून व्यवस्था की परवाह किये बिना कि वहां जिन्दल ने किस प्रवृति के लोगों को रखा है पूरी छूट दे दी। ग्रामीणों और बार संघ अल्मोडा द्वारा नैनीसार में जिन्दल के लोगों का वेरीफिकेशन कराये जाने का ज्ञापन बेअसर रहा। 2 नवम्बर 15 को आन्दोलित ग्रामीणों व उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी ने गैरसैंण विधानसभा सत्र के दौरान भूमि आवंटन के विरोध में प्रदर्शन किया और नेता प्रतिपक्ष ने सदन में भी हो हल्ले के बीच नैनीसार भूमि आवंटन का उल्लेख कर सरकार को आरोपित किया। 3 अक्टूबर 15 को सरकार ने सचिव राधा रतूडी व शैलेश बगोली को नैनीसार भूमि आवंटन की जांच सौंपी। लेकिन नैनीसार के ग्रामीणों अथवा परिवर्तन पार्टी के आन्दोलन को सरकार व प्रशासन ने पूरी तरह अनदेखा कर दिया।
   आन्दोलन की अनदेखी पर उपपा अध्यक्ष पीसी तिवारी ने सिविल जज की अदालत से स्टे ले लिया जिसे कोर्ट के मैसेन्जर के साथ पी सी तिवारी व उपपा महिला संगठन की सह संयोजक रेखा धस्माना 23 जनवरी 16 को नैनीसार गये तो जिन्दल के बाउन्सरों ने उन्हें घेर कर पकडा और बूरी तरह पिटाई कर दी। बंधक बनाने, जान लेवा हमले और लूट की तहरीर को तो अल्मोडा प्रशासन पचा गया लेकिन पी सी तिवारी, रेखा धस्माना और 11 अन्य आन्दोलनकारियों को आईपीसी की धारा 147,323,447,504व 506 में अल्मोडा जेल भेज दिया।  शानित भ्ंग में जमानत के बाद 11 आन्दोलनकारी तो रिहा हो गये लेकिन पीसी तिवारी व रेखा धस्माना पर एससी एसटी कानून की धारा 3-1-10 लगा कर जेल से रिहाई नही हो पायी ओर 12 दिन जेल में रहने के बाद सशर्त जमानत पर वे 4 फरवरी को रिहा हुए। 
      नैनीसार के मुद्दे ने उत्तराखण्ड के 15 साल के पन्ने पलट दिये हैं बल्कि 15 साल ही नही उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन और उत्तराखण्ड की परिकल्पना तक के पन्ने भी। उत्तराखण्ड की मांग को पं जवाहरलाल नेहरु की 1939 की उत्तराखण्ड यात्रा से जोडें अथवा सन् 1952 के भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के बम्बई अधिवेशन में सचिव पीसी जोशी के अलग राज्य प्रस्ताव, या फिर 1963 पर्वतीय राज्य परिषद्, उत्तराखण्ड का कांसेप्ट यदि पूरी तरह सामने आया तो तो वह सन् 1974 की अस्कोट-आराकोट यात्रा थी। वन आन्दोलन, विश्वविद्यालय आन्दोलन, उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी उत्तराखण्ड क्रांन्ति दल, पृथक राज्य का आन्दोलन, नशा नही रोजगार दो आन्दोलन, सन् 1994-96 का वह ज्वार और उप्र राज्य पुनर्गठन विधेयक 2000 जिसे संवैधानिक रुप से उत्तराखण्ड भारत संघ का 27 वां राज्य बना। 15 साल के 8 मुख्यमंत्री, 4 सरकारें और मंत्री, विधायक, लाल- नीली बत्ती और उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य।
    वन आन्दोलन से ही देखें तो 15 साल का शासक वर्ग उसमें कही नही था। वह ठेकेदारों का पक्षधर था। अस्कोट- आराकोट के कांसेप्ट बनाने के बजाय वे बाटने में महारत लिए थे, वाहिनी का सदस्य होने की बात एक बार मुख्य मंत्री हरीश रावत ने की थीं लेकिन पिछले 40 सालों वे उसंवा किसी किसी कार्यक्रम अथवा आन्दोलन में तो दिखे नही। उत्तराखण्ड क्रान्ति दल राजनैतिक पार्टी है और कोई कांग्रेसी अथवा भाजपाई उसके साथ किसी आन्दोलन में कैसे हो सकता है? नशा नही रोजगार में माफिया पर किसका बरदहस्त था लोग जानते हैं। अब रहा उत्त्राखण्ड राज्य आन्दोलन 2 अक्टूबर 1994 को मंच हथियाने की होड में कौन लोग शामिल थे और राजेश पाइलट से वार्ता में रातों-रात 58 संगठनों को बनाने में किसका योगदान था, लोग समझते हैं। उत्तराखण्ड के आन्दोलन की शक्तियों का एक इतिहास है। वे लडें हैं। वन आन्दोलन, विश्वविद्यालय आन्दोलन, नशा नही रोजगार दो आन्दोलन, उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन सबके जेल यात्री रहे हैं वे, उत्राखण्ड नही तो कार रैली नही आन्दोलन में खिसियाये प्रशासन ने जिस तरह पी सी और उनके साथियों को पीटे जाने कं बावजूद वह रैली रोक कर दिखाने का नायकत्व ही था।
      नैनीसार केवल एक गांव या तोक नही रह गया है यह प्रतीक हो गया है सत्ता के स्वेच्छाचार का, प्रशासन के लुंज-पुंज होने और आन्दोलनों के दमन का। आप उत्तराखण्ड में भूमाफिया के द्वार नैनीसार से खोल चुके थे आपने कुछ जमीनें और चिन्हित की है जो दूसरे जिन्दलों के लिए होंगी, यह उन जिन्दलों के लिए है जो वन आन्दोलन से लेकर आज तक के आन्दोलनों के अगुवा पी सी तिवारी को जान से मारने की कोशिश करते हैं। ये वे जिन्दल हैं जिनके लिए राष्ट्रध्वज का कोई सम्मान नही है और वे जिन्दल हैं जो सरकार और प्रशासन को जेब में रखते हैं।
  15 सालों में हमने सत्ता उन लोगों को दी जिनका राज्य अवधारणा से कोई संबन्ध नही, जो 15 साल उत्तराखण्ड में राज्य करने के बाद इसे केन्द्र शासित होने में भलाई देखते हैं। उत्तराखण्ड के सिर 26 संशोधनों की गठ्ठर लादने और जल विद्युत परियोजनाओ का एमओयू उत्तराखण्ड के बजाय कम्पनियों के पक्ष करने वाले, मुजफ्फरनगर के अपराधियों को प्रमोशन देने, राज्य आन्दोलनकारियों को उपद्रवी बताने की हद तक जाने वाले लोग-पार्टियां उत्तराखण्ड के हितैषी हो कैसे सकती है? जिन लोगों के सिर उत्तराखण्ड के गांधी इन्द्रमणी बडोनी का सिर फोडने का पाप हो वे कितने ही कुुम्भ नहा लें उनके पाप जाने वाले नही हैं। उत्तराखण्ड के जल-जंगल-जमीन पर कुदृष्टि केदारनाथ के बन्द कपाटों के दर्शन से भी मुक्ति नही देगी।
  जो प्रशासन व सरकार तिरंगे की शान में गुस्ताखी बर्दास्त करे उससे बडा नपुंसक कोई नही है। हमारे जवान सियाचिन में माइनस 41 डिग्री सेलसियस पर जिस तिरंगे की शान-बान के लिए अपना खून सुखा रहे हों और जिस तिरंगे पर करोडों करोड बलिदान हुए हों उसे अपमानित करने वालों को जो प्रशासन नजरअंदाज कर दे वह कम से कम देश व उत्तराखण्ड के काबिल तो नही है।
 जनमत जाग रहा है। 8 फरवरी की अल्मोडा में हुई जबाब दो रैली में पुराने आन्दोलनकारियों के साथ युवा और बडी संख्या में महिलाओं की भागीदारी बता रही है कि अब दलाली के दिन समाप्त होने वाले हैं। जैता इक नि त आलौ उ दिन य दूनी में गिर्दा वह दिन आयेगा जरुर। माफिया की हिमायती सरकार के दिन बूरे होगें। 
     
   









सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

अल्मोडा में 8 फरवरी की जबाब दो रैली- मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग

             नैनीसार में जिन्दल ग्रुप को भूमि आवंटन, पी सी तिवारी व रेखा धस्माना की गिरफतारी, राष्ट्र ध्वज के अपमान व गुण्डों को गिरफ्तार न करने के खिलाफ अल्मोडा में हुई जबाब दो रैली से अभी -अभी लौटा हूं। उत्तराखण्ड की क्षेत्रीय पार्टियों, जन संगठनों की व्यापक भागीदारी उत्साहवर्द्धक रही। डी एम अल्मोडा मुख्यालय पर उपस्थित  नही थे। और वक्ताओं ने सरकार और प्रशासन को बूरी तरह कठघरे में खडा किया। रैली पूरी तरह सफल रही है।
          आम जनता में नैनीसार के भूमि आवंटन को लेकर असन्तोष है और बातचीत में वह स्पष्ट दिख भी रहा है। ये कहना उचित होगा कि हरीश रावत सरकार नैनीसार मुद्दे पर पूरी तरह घिर चुकी है और मुख्यमंत्री के अपने बयान उनके गले की हड्डी बनते जा रहे हैं। 


















शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारियों के साथ मजाक कर रहे है सरकार और उसके कारकून

          उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारियों के साथ सरकार का मजाक तो है ही उसके कारकून भी अब्बल दर्जे का निकम्मापन दिखा रहे हैं। उत्तराखण्ड हाई कोर्ट को सरकार के वकील नहीं समझा पाये कि किसी भी आन्दोलन में आन्दोलनकारियों पर सच्चे झूठे मुकदमे लगाये बिना हमारा तंत्र मानता नही है। उत्तराखण्ड का आन्दोलन गांधीवाद की मिसाल रहा जहां आन्दोलनकारियों ने अपने सीने पर गोली झेली और मां बहिनों की अस्मिता पर हमले के बावजूद हिंसक नहीं हुए, कई बार इस अहिंसक प्रबृति की तीखी आलोचना भी हुई लेकिन अहिंसा के उस हथियार को उत्तराखण्डी मजबूती से पकडे रहे और राज्य ले लिया। हाई कोर्ट का तोड फोड के आरोपियों को उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन की सुविधा देने के तर्क से सहमत न होना निश्चित रुप से सरकार की पेरवी से जुडा मामला है। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन में एक पक्ष जनता थी तो दूसरी सरकार व उसकी पुलिस, तब भला वह आन्दोलनकारियों की प्रशंसा के पुल बाधती या उन्हें अपराधिक मामलों में आरोपित करती? उसने वही किया जो पुलिस का चरित्र है और शांति भंग से लेकर तोड-फोड, आगजनी जैसी धाराओं में मुकदमे दर्ज होना स्वाभाविक था।  3 नवम्बर 15 गैरसैंण के विधान सभा सत्र में विधान सभा ने उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारियों को 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का विधेयक पारित किया जिस पर राज्यपाल कुण्डली मारकर बैठ गये। और विधेयक कानून नही बन पाया।
        मुख्य मंत्री हरीश रावत ने 31 अगस्त 14 तक आन्दोलनकारियों के आवेदन की तिथि दी थी, कई ने आवेदन किए लेकिन वाह रे जांच अधिकारियो वे मानने को तैयार नहीं कि उत्तराखण्ड के लिए आवेदक भूख हडताल पर भी बैठा है। गैरसैंण क्षेत्र का मामला उदाहरण है। शासन द्वारा तय मानकों के अनुसार पुलिस, एल आई यू का रिपोर्ट, चिकित्सालय का प्रमाण और वे साक्ष्य जिनसे जिलाधिकारी सहमत हों चयन के आधार हैं। अधिकांश में पुलिस सन् 1994 व 1996 की जी डी नष्ट कर चुकी है। उस समय की एल आई यू रिपोर्ट भी उपलब्ध नहीं है,बडी मुश्किल से चिकित्सालय का प्रमाण पत्र मिला अब जांच अधिकारी राजस्व उपनिरीक्षक उसे प्रमाण मानने को ही तैयार नहीं हैं। पाठक स्वयं देखें कि चिकित्साधिक्षक का पत्र क्या अनशनकारियों के आन्दोलनकारी होने को नही प्रमाणित कर रहा है?
       8 फरवरी1996 से गैरसैंण के रामलीला मैदान मेें उत्तराखण्ड राज्य की मांग पर हुए आमरण अनशनकारी और प्राथमिक स्वा कंन्द्र द्वारा उनके स्वास्थ्य परीक्षण और पुलिस द्वारा जबरन उठाये जाने की सूची-
8 फरवरी 1996 आमरण अनशन पर बैठे-गोबिन्दसिंह नेगी,सुरेन्द्रसिंह बिष्ट,खीमसिंह रौथाण,रामेश्वर प्रसाद ढौंडियाल,दिलबर सिंह, जिन्ळें पुलिस ने 16 फरवरी को जबरन उठा कर जिला चिकित्सालय गोपेश्वर में फोर्स फीडिंग  करायी। 16 फरवरी 1996 को गैरसैंण में उत्तराखण्ड विकास के तत्कालीन प्रमुख सचिव सुरेन्द्र सिंह पांगती, कमिश्नर गढवाल (वर्तमान मुख्य सचिव) सुभाष कुमार और जिलाधिकारी चन्द्रसिंह में थे और उन्होंने आन्दोलनकारियों का हाल चाल पूछा था।
      16फरवरी 1996 को आमरण अनशन पर बैठे- पदमपति सिस्र्वाल, धनसिंह बिष्ट, विष्णु दत्त बेंजोला, सालिगराम मनोडी व प्रभाष कुमार, जिन्हें 27 फरवरी 1996 को जबरन उठा जिला चिकित्सालय गोपेश्वर ले जाया गया।
     27 फरवरी 1996 को आमरण अनशन पर बैठे- धूमादेवी, चन्द्रसिंह यायावर, बिक्रम सिंह परोडा, कै हिम्मतसिंह व गंगासिंह, जिन्हें 7 मार्च 1996 को जबरन उठाया गया।
  7 मार्च 1996 को आमरण अनशन पर बैठे-रामीदेवी, बसन्ती देवी, बचनसिंह, सुरेशानन्द सती, प्रतापसिंह व गोविन्दराम ढोंडियाल, जिन्हें 14 मार्च को जबरन उठा प्रा स्वा केन्द्र गैरसैंण में फोर्स फीडिंग कराई गयी।
     14 मार्च 1996 को आमरण अनशन पर बैठे-संग्रामी देवी, नन्दी देवी, देवेश्वरी देवी, बाग सिंह व रामसिंह, जिन्हें 21-22 मार्च को पुलिस प्रशासन द्वारा जवरन उठाया गया।  

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

नवम्बर से मार्च तक हिमाच्छादित रहने वाला उत्तराखण्ड का पामीर बर्फ विहीन

गैरसैंण, 5 फरवरी
उमेश नैलवाल
   नवम्बर से मार्च तक हिमाच्छादित रहने वाला उत्तराखण्ड का पामीर फरवरी के पहले सप्ताह में ही बर्फ विहीन है। सितम्बर के बाद पिछले चार महिनों में 4 सेमी से ज्यादा वर्षा ना होने से हिमपात भी नहीं के बराबर हुआ है। चमोली, पौडी व अल्मोडा तीन जनपदों में फैली दूधातोली श्रृंखला 2000 से 2400 मीटर की ऊंचाई का वन क्षेत्र है जहां से 5 सदानीरा नदियां पश्चिमी रामगंगा, रामगंगा, पश्चिमी एवं पूर्वी नयार, विनौ, आटागाड नदियों का उद्गम स्थल है।
    गैर ग्लेश्यिरी नदियों में पश्चिमी रामगंगा उत्तराखण्ड की सबसे बडी नदी है जो कन्नौज में गंगा से मिलती है। नवंबर से मार्च तक दूधातोली का हिमाच्छादित रहना भू-जल संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान अदा करता है। वहीं इन पांच सदानीरा नदियों को जल प्रवाह भी कराता है। स्थानीय जनता के पेयजल स्रोत भी दुधातोली वन क्षेत्र हैं।
    सूखे का असर जल स्रोत और नदियों के प्रवाह पर पडना निश्चित है वहीं रबी की फसल बरबाद होने से किसानों के चेहरे मुर्झा गये हैं। अब गर्मी में वनाग्नि के खतरे बढ गये हैं जिससे पशुपालन का भी प्रभावित होना लाजमी है।
   उल्लेखनीय है कि दुधातोली में तीनों जनपदों के सैकडों पशुचारक साल के 6 महीने खर्को में दुधातोली में ही निवास करते हैं। अवर्षण से चारे की भी समस्या बने तो आश्चर्य नहीं है।
   सलियाणा के वयोवृद्ध काश्तकार दरवान सिंह कहते हैं इस बार सूखे ने काश्तकारों की कमर तोड दी है और फसल पूरी तरह बरबाद हो गई है।

   राजुली देवी गौल कहती हैं कि फसल पूरी तरह बरबाद हो चुकी है।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

उत्तराखण्ड सरकार- निचिन्त ह्वे के से गिनी


        लोक कवि, गायक और उत्तराखण्ड के मर्मज्ञ नरेन्द्रसिंह नेगी की नौछमी नारायण में एकपद है -‘निचिन्त ह्वे के से गिनी----‘ यह सरकार के पदों पर विराजमान महानुभावों की कार्य शैली पर है। दो महिने में प्रदेश की दो हडतालों पर सरकारी गूंगा-बहरापन माननीय उच्च  न्यायालय के फैसले के बाद भी लगता नही टूटा है, हां हडताल पर कोर्ट का चाबुक हडताल तोडने को विवश जरुर कर गया।
          दिसम्बर में एक मरीज को हल्द्वानी के एक प्राइवेट अस्पताल में उनके परिजन लाते हैं और कुछ घंटे में वह मर जाता है, चिकित्सक परिजनों को कोई संतोषजनक जबाब नही दे पाते और वहां तोड फोड और चिकित्सकों की पिटाई हो जाती है। तुरन्त प्राईवेट अस्पताल हडताल कर देते हैं तीन दिन प्राईवेट अस्पतालों की हडताल में सरकारी डाक्टर भी कूद पडते है। और भगवान के बाद किसी मरीज को बचाने की जिम्मेदारी लिए डाक्टरों का गैरजिम्मेदारानापन सामने आता है। मरीजों को देखने के लिए न प्राइवेट अस्पताल होते है और न सरकारी।
         माननीय उच्च न्यायालय में जन हित याचिका पर कोर्ट हडताली डाक्टरों को 20 मिनट में काम पर लौटने का आदेश होता है और  हडताली दुम दबा कर काम पर  लौट आते हैं।
 कोषागार कर्मी सचिवालय के कोषागार कर्मियों के समान ग्रेड-पे देने की मांग पर पिछले 40 दिनों से हडताल पर हैं। कोषागारों पर ताले लटके हैं और वेतनभोगियों, पेंशनरों को वेतन व पेंशन के लाले पडे हैं, स्टाम्प नही मिलने से राजस्व का नुकसान हो रहा है और वित्त काम लगभग ठप्प हो जाता है। ऐसे में एक जनहित याचिका दायर होती है और न्यायालय से 3 दिन में हडताल समाप्त करने के आदेश होता है।
          ये तो रही हडताल और न्यायालय की बात। लेकिन सरकार जिस पर व्यस्था की जिम्मेदारी है एक कान तेल और दूसरे कान में घी डालकर कैसे सो जाती है उसका उदाहरण ये दो हडताल है। निजी चिकित्सालयों में मरीज और उसके परिजनों को इलाज के नाम पर लूटने की छूट यही सरकार देती है, वह चाहे किसी पार्टी की हो। किसी की जायज मांग को सुनना सरकार और उसके भ्रष्ट नौकरशाह अपनी तौहीन समझते हैं गोया वे जनता के सेवक नही शासक हों। आप सचिवालय में जो वेतनमान, ग्रेड पे या दूसरी सुविधायें दे रहे हैं और कर्मियों का क्यों नही मिलना चाहिए?
         महत्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि 40 दिनों में जनता परेशान रही और सरकारी -गैरसरकारी कार्य प्रभावित हुए और सरकार की तन्द्रा टूटी नहीं, राज्यपाल  जो हर छोटी-बडी खबर केन्द्र सरकार को भेजते हैं जनता को होने वाली परेशानी पर सरकार को तलब क्यों नही करते? घोषणाओं और घोटालों की राजनीति का अंत होना चाहिए और जनता को अपनी सोच में बदलाव लाना चाहिए कि सरकार और नौकरशाह हमारे शासक नहीं सेवक है और उन्हें उनकी हद भी बतानी होगी।    
 

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी और महिला नेता रेखा धस्माना सशर्त जेल से रिहा, तिवारी ने हरीश रावत सरकार को उखाड़ फेंकने का किया आह्वान


अल्मोड़ा, ३ फरवरी २०१६:
 उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी और पार्टी की महिला संगठन की केंद्रीय सह-संयोजिका रेखा धस्माना को आज सवेरे अल्मोड़ा जेल से सशर्त जमानत पर रिहा कर दिया गया.
९२-वर्षीय अग्रणी स्वतन्त्रता सेनानी देवेन्द्र सनवाल की अगुवाई में उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं तथा अनेक समर्थकों ने तिवारी और रेखा धस्माना का स्वागत किया.
इस अवसर पर पीसी तिवारी ने अल्मोड़ा जेल गेट पर एकत्रित लोगों को संबोधित करते हुए उत्तराखंड में सत्तारूढ़ हरीश रावत सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया और पूरे प्रदेश में इसके लिए आन्दोलन तेज करने को कहा. उन्होंने साथ ही कहा कि राज्य में जल-जंगल-जमीन और जन के पक्ष में जो नानीसार भूमि बचाओ आन्दोलन चलाया जा रहा है, उसे जीत होने तक जारी रखा जाएगा. ज्ञातव्य है कि हरीश रावत सरकार ने जिंदल ग्रुप की एक सस्था को अवैधानिक और अनैतिक ढंग से ३५३ ग्रामीण भूमि दे दी है और अभी इस जमीन का पट्टा तक जिंदल के पक्ष में नहीं हुआ है और वहां निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है.
ज्ञातव्य है कि ३१ जनवरी २०१६ को हल्द्वानी में आयोजित बैठक में राज्य के विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने नानीसार बचाओ संघर्ष समिति और उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी को समर्थन देते हुए एक संयुक्त संघर्ष समिति का गठन किया है जो अब इस आन्दोलन को चलाएगी. इस संयुक्त संघर्ष समिति में उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी और नानीसार बचाओ संघर्ष समिति के अतिरिक्त यूकेडी, आम आदमी पार्टी, स्वराज अभियान, उत्तराखंड महिला मंच, कार्लोस, आरडीएफ, उत्तराखंड जनविकास पार्टी और अनेक संगठन शामिल हैं.
सुरेश नौटियाल

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

नशा नही रोजगार दो आन्दोलन की 32 वीं वर्षगांठ जो शराब बिकवाता है वह देश का दुश्मन है-


गैरसैंण, 2 फरवरी
           आज के ही दिन अल्मोडा जिला के बसभीडा ग्राम से शराब के विरुद्ध उठी जंग ने उत्तराखण्ड में एक ऐतिहासिक आन्दोलन ‘नशा नही रोजगार दो‘ को जन्म दिया। उत्तराखण्ड में शराब को बुराई  की हद तक घृणा करने वाले समाज  में 6 ठें दशक तक बुराई और आतंक का रुप ले लिया था। सर्वोदयी कार्यकर्ताओं ने विभिन्न स्थानों पर सशक्त आन्दोलन चलाकर नशे का प्रतिकार किया और बाध्य होकर उप्र सरकार को उत्तराखण्ड के पहाडी जिलों में नशाबन्दी लागू करनी पडी।
              नशाबन्दी की तोड शराब माफिया ने तस्करी और आयुर्वेदिक दवाओं के नाम पर सुरा,  संजीवनी सुरा, बायोटांनिक और भी कितने ही नामों से 45 प्रतिशत से अधिक एल्कोहल के जहर खुले आम बेचने प्रारम्भ कर दिए। कहना न होगा कि इन्हें बेचने और बिकवाने वाला माफिया सत्ता के भी दलाल थे।
             दो फरवरी 1984 को बसभीडा में उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी के बैनर तले नशा तंत्र के विरुद्ध आन्दोलन का निर्णय लिया गया जिसमें बडी संख्या में महिलाऐं भी थी। बसभीडा से प्रारम्भ आन्दोलन उत्तराखण्ड के गांव-गांव तक पहुंच गया। आन्दोलन के नारे थे-
                                                  जो शराब पीता है-वह परिवार का दुश्मन है।
                                                      जो शराब बेचता है-वह समाज का दुश्मन है
                                                          जो शराब बिकवाता है-वह समाज का दुश्मन है
            शराब पीने वाले परिवार से दुश्मनी, बेचने वाले समाज से और बिकवाने वाले देश से दुश्मनी करते रहे हैं। आज भी आवकारी को प्रदेश के राजस्व का मुख्य स्रोत मानने वाले लोग अपनी भूमिका तय करें तो अच्छा होगा।
         नशा नही रोजगार दो आन्दोलन के ही एक नायक सरकार की जिन्दल गु्रप के साथ पहाडी जमीन की बन्दरबाट के विरुद्ध आन्दोलन में सरकार और माफिया साजिश के शिकार हो जेल में हैं। उत्तराखण्ड के जल-जंगल-जमीन से लडने वाले नायकों मुकाबला सत्ता के उन दलालों से है जो सातवें दशक में लीसा-लकडी, उसके बाद शराब और अब जमीन के   लिए चुनौती भी है कि आजीवन जनता के लिए लडने वाले लोग और आजीवन सत्ता की  राजनीति का यह मुकाबला जनता के दम पर ही जीता जा सकेगा। जनता की जीत का सिपाही यदि कैद में हो तो जिम्मेदारी बडी हो गयी है, ये महसूसना होगा।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

विकास कार्यकर्ता का विकास तो नही गुण्डे जरुर दिख रहे हैं

विकास कार्यकर्ता का विकास तो नही गुण्डे जरुर दिख रहे हैं
मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने को विकास कार्यकर्ता कह रहे हैं। रविवार को वे रुद्रपुर में वही बातें उसी अंदाज में कह रहे थे जो उनका चिर परिचित अंदाज है जिसमें कोई भी राजनेता अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को दोयम दर्जे का बताने से नही चूकता।
   आपकी बातें सुनते हैं तो लगता है आप बडी शिद्दत से उत्तराखण्ड के विकास में लगे हैं और यदि कहें तो उत्तराखण्ड के विकास पुरुष का श्रेय लेने की होड में आप हैं। आपका विकास शिक्षा- चिकित्सा, सडक-परिवहन, कृषि-बागवानी और यहां तक कि आपकी घोषणाओं के हवाई होने की हद तक कहीं दिख नही रहा है। केदारनाथ में कर्नल कोठियाल और उनकी टीम का परिश्रम आपको बहुत कुछ राहत दे रहा है लेकिन उन परिथतियों की ओर आप नही सोच रहे हैं कि चोरवाडी झील आखिर टूटने के कारण क्या हैं?
    उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जितना दखल बढेगा निश्चित रुप से प्रकृति उतनी ही कुपित होगी। केदारनाथ यात्रा में हैली प्रयोग सीमित के बजाय असीमित करने के प्रयासों का कहीं न कहीं केदारनाथ आपदा से सम्बन्ध निकलता है। विज्ञान के युग में इस पर व्यापक वैज्ञानिक बहस नही हुई है। मानें कि केदारनाथ यात्रा प्रारम्भ करना आपकी सफलता का सफर शुरु करता इसके साथ आपदा के वे घोटाले जो सही मायने में  सामने आये भी नही आपने उन्हें क्लीन चिट दे दी। दो साल पहले की अवर्षण को दैवी आपदा मानते हुए उत्तराखण्ड सरकार ने पहाडों के प्रत्येक काश्तकार को 1500 रु दैवी आपदा का मुवावजा दो तिहाई गांवों में अब भी नही बटा है। यही स्थिति मेरा पेड-मेरा धन, मेरा गांव-मेरी सडक, मेरे बुजर्ग-मेरे तीर्थ और सारी योजनाओं की जो आप बार-बार बखान कर रहे हैं। बजट में धनराशि की व्यस्था के बिना कोई भी योजना हवा में नही लटकेगी तो कहां जायेगी? पीपीपी मोड की असफलता को स्वीकारें अथवा नही ये पूरी तरह फ्राॅड सावित हो चुके हैं। सडक के लिए आपके ही जिले की चैखुटिया-मासी सडक देख लें तो सडकों का एक खाका आपके दिमाग में भी बने।
  वीरपुर लच्छी, नैनीसार में हमने गुंण्डों का आतंक देख लिया, राष्ट्र ध्वज का अपमान भी और खनन रोकने गये वन व प्रशासन के अधिकारियों को कुचलने के प्रयास भी।
    आपने खल्डुवा में कहा- पीसी नैनीसार के नही हैं। यदि नैनीसार के लोग कहेंगे तो जिंदल का आवंटन रद्द कर देंगे। इससे पहले आपने शिक्षा और विकास न चाहने की स्थिति में आवंटन रद्द करने की बात कही थी। अब आप पाॅलिसी भी नैनीसार और जिंदल के बीच ले आये हैं। इतना सारा घालमेल? पहली बात तो आप जिस स्थान के बारे में जितना कुछ कहते हैं क्या आप उन सब जगह के हैं? हम केवल उस स्थान के पैदाइश की बात कर रहे हैं, आप इसलिए बोलते हैं कि आप उस राज्य के मुख्यमंत्री हैं, आपको यह पद संविधान ने दिया है, उसी संविधान ने जिसने हम सब लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। पी सी तिवारी एक क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी के अध्यक्ष होने के नाते वह सब बोलेंगे जिसे वे ठीक समण्ते हैं। सरकार की उन नीतियों, कायों की आलोचना भी जो जनता के हित प्रभावित करती है। उन पर गुण्डे छुडा, जेल में बन्द कर आप दमन के रास्ते पर चल रहे हैं। उत्तराखण्ड में सत्ता के दुरुपयोग की शुरुआत तो बेगुनाहों को माओआदी बताकर हो ही चुकी थी आपके राज में सार्वजनिक जीवन के लोगों पर हमले करा गुण्डाराज की गूंज सुनाई देने लगी है।         ं
    उत्तराखण्ड आन्दोलनों की भूमि है और दमन से घबराकर कोई पीछे नही हटेगा ये शायद चेतन-अवचेतन मन में अवश्य होगा।















विकास कार्यकर्ता का विकास तो नही गुण्डे जरुर दिख रहे हैं
मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने को विकास कार्यकर्ता कह रहे हैं। रविवार को वे रुद्रपुर में वही बातें उसी अंदाज में कह रहे थे जो उनका चिर परिचित अंदाज है जिसमें कोई भी राजनेता अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को दोयम दर्जे का बताने से नही चूकता।
   आपकी बातें सुनते हैं तो लगता है आप बडी शिद्दत से उत्तराखण्ड के विकास में लगे हैं और यदि कहें तो उत्तराखण्ड के विकास पुरुष का श्रेय लेने की होड में आप हैं। आपका विकास शिक्षा- चिकित्सा, सडक-परिवहन, कृषि-बागवानी और यहां तक कि आपकी घोषणाओं के हवाई होने की हद तक कहीं दिख नही रहा है। केदारनाथ में कर्नल कोठियाल और उनकी टीम का परिश्रम आपको बहुत कुछ राहत दे रहा है लेकिन उन परिथतियों की ओर आप नही सोच रहे हैं कि चोरवाडी झील आखिर टूटने के कारण क्या हैं?
    उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जितना दखल बढेगा निश्चित रुप से प्रकृति उतनी ही कुपित होगी। केदारनाथ यात्रा में हैली प्रयोग सीमित के बजाय असीमित करने के प्रयासों का कहीं न कहीं केदारनाथ आपदा से सम्बन्ध निकलता है। विज्ञान के युग में इस पर व्यापक वैज्ञानिक बहस नही हुई है। मानें कि केदारनाथ यात्रा प्रारम्भ करना आपकी सफलता का सफर शुरु करता इसके साथ आपदा के वे घोटाले जो सही मायने में  सामने आये भी नही आपने उन्हें क्लीन चिट दे दी। दो साल पहले की अवर्षण को दैवी आपदा मानते हुए उत्तराखण्ड सरकार ने पहाडों के प्रत्येक काश्तकार को 1500 रु दैवी आपदा का मुवावजा दो तिहाई गांवों में अब भी नही बटा है। यही स्थिति मेरा पेड-मेरा धन, मेरा गांव-मेरी सडक, मेरे बुजर्ग-मेरे तीर्थ और सारी योजनाओं की जो आप बार-बार बखान कर रहे हैं। बजट में धनराशि की व्यस्था के बिना कोई भी योजना हवा में नही लटकेगी तो कहां जायेगी? पीपीपी मोड की असफलता को स्वीकारें अथवा नही ये पूरी तरह फ्राॅड सावित हो चुके हैं। सडक के लिए आपके ही जिले की चैखुटिया-मासी सडक देख लें तो सडकों का एक खाका आपके दिमाग में भी बने।
  वीरपुर लच्छी, नैनीसार में हमने गुंण्डों का आतंक देख लिया, राष्ट्र ध्वज का अपमान भी और खनन रोकने गये वन व प्रशासन के अधिकारियों को कुचलने के प्रयास भी।
    आपने खल्डुवा में कहा- पीसी नैनीसार के नही हैं। यदि नैनीसार के लोग कहेंगे तो जिंदल का आवंटन रद्द कर देंगे। इससे पहले आपने शिक्षा और विकास न चाहने की स्थिति में आवंटन रद्द करने की बात कही थी। अब आप पाॅलिसी भी नैनीसार और जिंदल के बीच ले आये हैं। इतना सारा घालमेल? पहली बात तो आप जिस स्थान के बारे में जितना कुछ कहते हैं क्या आप उन सब जगह के हैं? हम केवल उस स्थान के पैदाइश की बात कर रहे हैं, आप इसलिए बोलते हैं कि आप उस राज्य के मुख्यमंत्री हैं, आपको यह पद संविधान ने दिया है, उसी संविधान ने जिसने हम सब लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। पी सी तिवारी एक क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी के अध्यक्ष होने के नाते वह सब बोलेंगे जिसे वे ठीक समण्ते हैं। सरकार की उन नीतियों, कायों की आलोचना भी जो जनता के हित प्रभावित करती है। उन पर गुण्डे छुडा, जेल में बन्द कर आप दमन के रास्ते पर चल रहे हैं। उत्तराखण्ड में सत्ता के दुरुपयोग की शुरुआत तो बेगुनाहों को माओआदी बताकर हो ही चुकी थी आपके राज में सार्वजनिक जीवन के लोगों पर हमले करा गुण्डाराज की गूंज सुनाई देने लगी है।         ं
    उत्तराखण्ड आन्दोलनों की भूमि है और दमन से घबराकर कोई पीछे नही हटेगा ये शायद चेतन-अवचेतन मन में अवश्य होगा।





         मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने को विकास कार्यकर्ता कह रहे हैं। रविवार को वे रुद्रपुर में वही बातें उसी अंदाज में कह रहे थे जो उनका चिर परिचित अंदाज है जिसमें कोई भी राजनेता अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को दोयम दर्जे का बताने से नही चूकता।
         आपकी बातें सुनते हैं तो लगता है आप बडी शिद्दत से उत्तराखण्ड के विकास में लगे हैं और यदि कहें तो उत्तराखण्ड के विकास पुरुष का श्रेय लेने की होड में आप हैं। आपका विकास शिक्षा- चिकित्सा, सडक-परिवहन, कृषि-बागवानी और यहां तक कि आपकी घोषणाओं के हवाई होने की हद तक कहीं दिख नही रहा है। केदारनाथ में कर्नल कोठियाल और उनकी टीम का परिश्रम आपको बहुत कुछ राहत दे रहा है लेकिन उन परिथतियों की ओर आप नही सोच रहे हैं कि चोरवाडी झील आखिर टूटने के कारण क्या हैं?
        उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जितना दखल बढेगा निश्चित रुप से प्रकृति उतनी ही कुपित होगी। केदारनाथ यात्रा में हैली प्रयोग सीमित के बजाय असीमित करने के प्रयासों का कहीं न कहीं केदारनाथ आपदा से सम्बन्ध निकलता है। विज्ञान के युग में इस पर व्यापक वैज्ञानिक बहस नही हुई है। मानें कि केदारनाथ यात्रा प्रारम्भ करना आपकी सफलता का सफर शुरु करता इसके साथ आपदा के वे घोटाले जो सही मायने में  सामने आये भी नही आपने उन्हें क्लीन चिट दे दी। दो साल पहले की अवर्षण को दैवी आपदा मानते हुए उत्तराखण्ड सरकार ने पहाडों के प्रत्येक काश्तकार को 1500 रु दैवी आपदा का मुवावजा दो तिहाई गांवों में अब भी नही बटा है। यही स्थिति मेरा पेड-मेरा धन, मेरा गांव-मेरी सडक, मेरे बुजर्ग-मेरे तीर्थ और सारी योजनाओं की जो आप बार-बार बखान कर रहे हैं। बजट में धनराशि की व्यस्था के बिना कोई भी योजना हवा में नही लटकेगी तो कहां जायेगी? पीपीपी मोड की असफलता को स्वीकारें अथवा नही ये पूरी तरह फ्राॅड सावित हो चुके हैं। सडक के लिए आपके ही जिले की चैखुटिया-मासी सडक देख लें तो सडकों का एक खाका आपके दिमाग में भी बने।
         वीरपुर लच्छी, नैनीसार में हमने गुंण्डों का आतंक देख लिया, राष्ट्र ध्वज का अपमान भी और खनन रोकने गये वन व प्रशासन के अधिकारियों को कुचलने के प्रयास भी।
          आपने खल्डुवा में कहा- पीसी नैनीसार के नही हैं। यदि नैनीसार के लोग कहेंगे तो जिंदल का आवंटन रद्द कर देंगे। इससे पहले आपने शिक्षा और विकास न चाहने की स्थिति में आवंटन रद्द करने की बात कही थी। अब आप पाॅलिसी भी नैनीसार और जिंदल के बीच ले आये हैं। इतना सारा घालमेल? पहली बात तो आप जिस स्थान के बारे में जितना कुछ कहते हैं क्या आप उन सब जगह के हैं? हम केवल उस स्थान के पैदाइश की बात कर रहे हैं, आप इसलिए बोलते हैं कि आप उस राज्य के मुख्यमंत्री हैं, आपको यह पद संविधान ने दिया है, उसी संविधान ने जिसने हम सब लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। पी सी तिवारी एक क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी के अध्यक्ष होने के नाते वह सब बोलेंगे जिसे वे ठीक समण्ते हैं। सरकार की उन नीतियों, कायों की आलोचना भी जो जनता के हित प्रभावित करती है। उन पर गुण्डे छुडा, जेल में बन्द कर आप दमन के रास्ते पर चल रहे हैं। उत्तराखण्ड में सत्ता के दुरुपयोग की शुरुआत तो बेगुनाहों को माओआदी बताकर हो ही चुकी थी आपके राज में सार्वजनिक जीवन के लोगों पर हमले करा गुण्डाराज की गूंज सुनाई देने लगी है।         ं
       उत्तराखण्ड आन्दोलनों की भूमि है और दमन से घबराकर कोई पीछे नही हटेगा ये शायद चेतन-अवचेतन मन में अवश्य होगा।