पुलवामा हमला-
इमानदार कदम तो उठाइए
पुरुषोत्तम असनोड़ा
भारत के शहर,गांवों में शोक की लहर है। 40 सी आर पी एफ जवानों की शहादत से लोगों में गुस्सा है। लोग बदला लेने की बात कर रहे हैं।टी वी चैनल चिंघाड़ रहे हैं। नेताओं और कार्यकर्ताओं का अपना हित और अपनी निष्ठा हावी है।
शहीदों के पार्थिव शरीर उनके घर पहुंचने लगे हैं। वही रुदन, चीख पुकार, विकराल भविष्य, घर परिवार के बीच सांत्वना देते लोग और शहीदो हम शर्मिंदा हैं तुम्हारे कातिल जिन्दा के नारे, गर्वोक्ति वही सब बातें जो इतने सालों से होता है।
शहीद देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देते हैं, वे गर्व के योग्य और नमनीय हैं। ये भी सही है कि देश की रक्षा में तैनात गरीब, किसान, मजदूर का बेटा है और उसकी शहादत पर सीना चौड़ा करने वाले लोगों ने ही ये परिस्थितियां पैदा की हैं।
पुलवामा का हमलावर कश्मीरी आतंकी ही था। विस्फोट के बाद वहां गोलियां भी चली। 72 साल पहले भारत में विलय हुआ जम्मू-कश्मीर आज भी भारत से आत्मसात क्यों नहीं हुआ? आतंक की जड़ें अफगानिस्तान से पाकिस्तान होते हुए कश्मीर पहुंच गयी और सत्ता हमेशा अपनी पीठ ढोंकती रही।
टी वी चैनलों को अपनी ट्रायल बंद करनी चाहिए। पहली खबरों 350 किग्रा बिस्फोटक लदी एसयूवी बतायी गयी, फिर 60 किग्रा आरडीएक्स वाली कार बतायी गयी और अब बिस्फोटक अमोनिया नाइट्रेट बताया जा रहा है, ये सब एक्सपर्ट पर छोड़ दो मेरे मालिक!, तुम्हारी प्रयुक्त बिस्फोटक की खबर एक दिन बाद भी आयेगी तो अंतर नहीं पड़ेगा, वहीं अंतर शहीदों की संख्या के बारे में 42,44,37,40 अधिकारिक आंकड़े आने दीजिए। इससे जग हंसाई और भ्रम पैदा होता है। उत्तराखंड से वीरेंद्र राणा और मोहनलाल रतूड़ी शहीद हुए हैं, तीसरे की आफवाह उड गयी।
समस्या बड़ी है इसलिए समाधान भी बड़ा चाहिए।70 साल में जो समाधान नहीं निकाला वह 70 घंटे में नहीं निकलेगा। प्रयास इमानदार तो हों। चोर का काम ही चोरी है, साहूकार अपनी संपत्ति कैसे बचाता है ये उसका कौशल है और भारतीय सत्ता अब तक अपनी संपत्ति बचाने में विफल रही है जो संतानें देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान कर रही हैं उन्हें नहीं बचा सकी हैं।
इमानदार कदम तो उठाइए
पुरुषोत्तम असनोड़ा
भारत के शहर,गांवों में शोक की लहर है। 40 सी आर पी एफ जवानों की शहादत से लोगों में गुस्सा है। लोग बदला लेने की बात कर रहे हैं।टी वी चैनल चिंघाड़ रहे हैं। नेताओं और कार्यकर्ताओं का अपना हित और अपनी निष्ठा हावी है।
शहीदों के पार्थिव शरीर उनके घर पहुंचने लगे हैं। वही रुदन, चीख पुकार, विकराल भविष्य, घर परिवार के बीच सांत्वना देते लोग और शहीदो हम शर्मिंदा हैं तुम्हारे कातिल जिन्दा के नारे, गर्वोक्ति वही सब बातें जो इतने सालों से होता है।
शहीद देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देते हैं, वे गर्व के योग्य और नमनीय हैं। ये भी सही है कि देश की रक्षा में तैनात गरीब, किसान, मजदूर का बेटा है और उसकी शहादत पर सीना चौड़ा करने वाले लोगों ने ही ये परिस्थितियां पैदा की हैं।
पुलवामा का हमलावर कश्मीरी आतंकी ही था। विस्फोट के बाद वहां गोलियां भी चली। 72 साल पहले भारत में विलय हुआ जम्मू-कश्मीर आज भी भारत से आत्मसात क्यों नहीं हुआ? आतंक की जड़ें अफगानिस्तान से पाकिस्तान होते हुए कश्मीर पहुंच गयी और सत्ता हमेशा अपनी पीठ ढोंकती रही।
टी वी चैनलों को अपनी ट्रायल बंद करनी चाहिए। पहली खबरों 350 किग्रा बिस्फोटक लदी एसयूवी बतायी गयी, फिर 60 किग्रा आरडीएक्स वाली कार बतायी गयी और अब बिस्फोटक अमोनिया नाइट्रेट बताया जा रहा है, ये सब एक्सपर्ट पर छोड़ दो मेरे मालिक!, तुम्हारी प्रयुक्त बिस्फोटक की खबर एक दिन बाद भी आयेगी तो अंतर नहीं पड़ेगा, वहीं अंतर शहीदों की संख्या के बारे में 42,44,37,40 अधिकारिक आंकड़े आने दीजिए। इससे जग हंसाई और भ्रम पैदा होता है। उत्तराखंड से वीरेंद्र राणा और मोहनलाल रतूड़ी शहीद हुए हैं, तीसरे की आफवाह उड गयी।
समस्या बड़ी है इसलिए समाधान भी बड़ा चाहिए।70 साल में जो समाधान नहीं निकाला वह 70 घंटे में नहीं निकलेगा। प्रयास इमानदार तो हों। चोर का काम ही चोरी है, साहूकार अपनी संपत्ति कैसे बचाता है ये उसका कौशल है और भारतीय सत्ता अब तक अपनी संपत्ति बचाने में विफल रही है जो संतानें देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान कर रही हैं उन्हें नहीं बचा सकी हैं।

माहौल गंभीर से खोफ़नाक बनाने के क्रम में कोई कसर ना रह जाए, मुख्य धारा का मीडिया इस बात के लिए कोई भी झूठ और तथ्य पैदा करने के लिए तत्पर है। उम्दा लेख।
जवाब देंहटाएं