गुरुवार, 19 नवंबर 2015

स्व चन्द्रसिंह यायावर स्मृति समारोह कल
उत्तराखण्ड के पहले ओलम्पियन एथलीट सुरेन्द्र भण्डारी को मिलेगा यायावर सम्मान
उत्तराखण्ड में खेल और चुनौतियांके मुख्य वक्ता होगें सुरेन्द्र
गैरसैंण, 20 नवम्बर, प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता, विचारक, टेªड यूनियन लीडर और उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी चन्द्रसिंह यायावर की 6ठी पुण्यतिथि 21 नवम्बर को विकास खण्ड सभागार में स्मृति समारोह आयोजित हो रहा है।
   विधान सभा उपाध्यक्ष डा अनुसूया प्रसाद मैखुरी को मुख्य अथिति के रुप में आमंत्रित किया गया है। समारोह में उत्तराखण्ड के पहले ओलम्पियन एथलीट सुरेन्द्रसिंह भण्डारी को स्व चन्द्रसिंह यायावर स्मृति सम्मान से सम्मानित किया जायेगा। इस सम्मान  से सम्मानित होने वाले वे 6ठी विभूति हैं।
   ग्राम स्तर पर उत्कृष्ट कार्य करने वाले महिला मंगल दल पंवार बाखली कुशरानी व शिक्षा क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए राजकीय बालिका इण्टर कालेज की प्रधानाखर्य शकुन्तला रावत भी सम्मानित होंगी।  समारोह के पहले सत्र में ‘ उत्तराखण्ड में खेल और चुनौतियां‘ विषय पर होने वाली गोष्ठी में श्री भण्डारी मुख्य वक्ता हैं।
  सेना में सुबेदार सुरेन्द्र भण्डारी  वीजिंग ओलम्पिक, दोहा एशिया खेल के साथ कई अन्तराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं औंर 3000 मी व 10000 दौउ के राष्ट्रीय रिकार्ड उनके नाम हैं। वर्तमान में वे राष्ट्रीय खेल प्राधिकरण के सेना की ओर से  कोच है और ऊंटी में भारत के एथलीट गढ़ रहे ळैं। श्री भण्डारी आज अपने गांव फुलढुंगी घंडियाल पहुंचेंगे जबकि समारोह में भाग लेने के लिए स्व चन्द्रसिेह यायावर के कनिष्ठ पुत्र राहुल रावत गैरसैंण पहुंच रहे हैं।
 यायावर जन चेतना समिति महासचिव डा सी एस भण्डारी ने बताया कि समारोह की सभी तैयारियां पूरी कर ली गयी हैं। उन्होंने कहा- ओलम्पियन एथलीट के सम्मान समारोह को लेकर छात्रों, युवाओं व आम नागरिकों में खासा उत्साह है।

स्व चन्द्रसिंह यायावर सम्मान से सम्मानित सूची-
1- हेम गैरोला- पर्यावरण कार्यकर्ता
2-घनश्याम ढौंडियाल- शिक्षक
3- लक्ष्मणसिंह नेगी- सामाजिक कार्यकर्ता, आन्दोलनकारी
4- नरेन्द्रसिंह चाकर- सामाजिक कार्यकर्ता
5- महिला मंगल दल सिलंगी- शराबबन्दी

कुनीगाड में मिला मृत गुलदार
गैरसैंण, 19 नवम्बर
    कुनीगाड के भण्डारीखोड गधेरे में एक नर गुलदार मृत मिला। ग्राम प्रधान भण्डारीखोड बसन्ती फस्र्वाण व क्षेत्रपंचायत सदस्य लीलाधर जोशी की सूचना पर बुधवार सायं वन विभाग की लोहवा रेंज टीम ने मृत गुलदार को कब्जे में लिया और रेंज कार्यालय लाये।
   वन विभाग की टीम में वन क्षेत्राधिकारी पीएस बुटोला, वन दरोगा बचन सिंह नेगी, भाग चन्द्र, अवतार सिंह व वन आरक्षी जमन सिंह आदि शामिल थे।

   नर बाघ की पूंछ सहित लम्बाई 2.15 मीटर तथा ऊंचाई 72 सेमी है। पशुचिकित्साधिकारी पशु प्रजनन केन्द्र भराडीसैंण डाॅ सुन्दर सिंह मनराल व पशुचिकित्साधिकारी डाॅ मनोज के पैनल ने मृत गुलदार का पोस्टमार्डम किया। पोस्टमार्डम रिपोर्ट के अनुसार गुलदार की मौत गले में हड्डी फंसना बताया गया है। वन विभाग के अनुसार इससे पहले गुलदार ने कई जानवरों को निवाला बनाया था।
संपर्क मार्ग निर्माण में दबी सिंचाई नहर व पेयजल लाईन
पीमजीएसआरवाई अधिकारी नही दे रहे कान
दिवाधार-कण्डारीखोड संपर्क मार्ग का मामला
गैरसैंण, 19 नवम्बर,खनसर घाटी में दिवाधार -कण्डारीखोड मोटर संपर्क मार्ग निर्माण मे ं सारंगांव ग्राम की सिंचाई नहर व पेयजल योजना के क्षति ग्रस्त होने से ग्रामीण आक्रोशित है। और शीघ्र नहर व पेयजल योजना ठीक न होने की स्थिति में आन्दोलन की चेतावनी दी है।
 ग्राम प्रधान व ग्राम वासियों द्वारा जिलाधिकारी को दिए ज्ञापन में गांव की लगभग 500 आवादी और पशुओं के लिए पेयजल समस्या का  उललेख करते हुए कहा है-सारंगांव की 1 किमी नहर टूटने से 600 नाली सिंचित भूमि बंजर हो रही है वही ग्राम पंचायत द्वारा निर्मित 300 मी लम्बी पेयजल योजना के क्षतिग्रस्त होने से पेयजल संकट गहरा गया है।
  प्रधान मंत्री ग्राम सडक योजना के अभियंताओं से 28 अगस्त 15 को हूई वार्ता के क्रम ग्रामीणों को नहर व पेयजल योजना को दुरस्त करने के आश्वासन के वावजूद क्षतिग्रस्त योजनाओं को ठीक नही करने से ग्रामीणों में खासा रोष हैं।
   ग्राम प्रधान दिवागाड रघुवीरसिंह ने पीमजीएसआरवाई अभियंताओं पर ग्रामीणों की फजीहत का आरोप लगाते हुए कहा-यदि सारंगांव के ग्रामीणों की समस्या का समाधान नही हुआ तो 10 दिसम्बर धरना-प्रदर्शन के साथ मोटर मार्ग का निर्माण रोक देंगे।


आंध्र ने अमरावती की नींव रख ली और  हम गैरसैंण नही तयकर पा रहे हंै
          उत्तर और दक्षिण में सचमुच अंतर है। न केवल जलवायु, भाषा और संस्कृति का बल्कि कार्य पद्धति का भी।  आर्य सभ्यता के वंशज द्रविणों को कितना ही हेय मानें लेकिन द्रविण सभ्यता के वंशज आज की वास्तविकता में हमसे कई गुना आगे हैं। नया सवाल आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती का है। ठीक विजय दशमी के दिन आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती का शिलान्यास हो गया। एक साल पहले तक जो लोग  राज्य के विभाजन  पर मरने मारने को उतारु थे उन्होंने न केवल राजधानी हैदराबाद पर दावा छोडते हुए अमरावती को राजधानी बनाने का निर्णय लिया बल्कि अमरावती को नये सिरे बनाने बसाने को कार्य रुप देना प्रारम्भ कर दिया।   दस साल तक हैदराबाद में संयुक्त राजधानी रहने तक वे भली प्रकार अमरावती को सजा-धजा राजधानी बना लेंगे।
    15 साल पहले गठित उत्तराखण्ड के गठन को लेकर किसी को भी आपत्ति नही थी। उ प्र विधान सभा ने उत्तराखण्ड राज्य गठन के कम से कम तीन प्रस्ताव पारित कर केन्द्र को भेजे। राज्य गठन की मांग का उत्तराखण्ड में व्यापक आन्दोलन हुआ, 42 शहादतें हुई और संसद में भी बिना किसी विरोध के उप्र राज्य पुनर्गठन विधेयक 2000 पारित हो गया जिसके फलस्वरुप वैधानिक रुप से उत्तराखण्ड राज्य अस्तित्व में आया और 9 नवम्बर 2000 उसकी स्थापना तिथि बनी।ं इसे भी उत्तर भारतीय सत्ता चरित्र के रुप में देखा जाना चाहिए कि जिस मांग पर किसी को आपत्ति नहीं थी उसी मांग पर आन्दोलनकारियों को गोलियों से भूना गया,  शहादतें हुई  और मुजफ्फर नगर जैसा घिनौना कृत्य हुआ।
      यह भी सत्ता चरित्र ही है कि राज्य पुनर्गठन विधेयक में सर्व सम्मति से स्वीकार्य राजधानी का उल्लेख छोड दिया गया और पहाडी राज्य की पहाडी राजधानी आन्दोलन का कारण बन गयी, बाबा मोहन उत्तराखण्डी को शहादत देनी पडी। 15 साल से हम अवैधानिक रुप से राज्य की राजधानी बनाये देहरादून को नर्क में तब्दील कर रहे हैं और आज भी दो राजधानियों का भौंडा प्रस्ताव परोस रहे हैं। हमारे राजनैतिक दलों के नेताओं में साहस नही है कि वे राज्य हित में कोई निर्णय ले सकें और उससे अपनी पार्टी और नेतृत्व को सहमत करा सकें। व्यक्तिगत रुप से संस्थागत बातों में माहिर ऐसे नेताओं और नेतृत्व ने 15 सालों में उत्तराख्ण्ड की फजीहत की है। तीन लाख से अधिक घरों पर ताले लग गये है। और तीन हजार से अधिक गांव वीरान हो गये हैं। हद तो यह है कि जिन साढे तीन से गांवों को प्राकृतिक आपदा के दौर से विस्थापित किया जाना है उसके लिए कोई रोडमैप नही है।
   गैरसैंण को उतराखण्ड क्रान्ति दल ने सन् 1992 मंे उत्तराखण्ड की औपचारिक राजधानी घोषित कर दिया था। सन् 1994 में रमा शंकर कौशिक समिति ने उत्तराखण्ड राज्य के साथ गैरसैंण राजधानी की अनुशंसा की थी। यह भी उसी चरित्र का हिस्सा है कि रमाशंकर कौशिक समिति गठित करने वाले मुख्य मंत्री मुलायमसिंह की सरकार में ही गांधी जयन्ती 2 अक्टूबर सन् 1994 को कलंकित कर मुजफ्फरनगर का बर्बर घिनौना काण्ड किया और मुलायमसिंह ने उस पर खेद भी व्यक्त नही किया। उप्र, उत्तराखण्ड और केन्द्र की किसी भी सरकार ने दोषियों सजा देने के बजाय प्रोन्नति दी जो आन्दोलनकारियों के जख्म पर नमक छिंडकने सरीखा था। पिछले तीन साल से गैरसैंण फिर चर्चा में है गैरसैंण के एक भाग भराडी सैंण जहां सातवें दशक में पशुपालन की महत्वाकांक्षी परियोजना विदेशी पशु प्रजनन प्रक्षेत्र के के 100 हेक्अेयर क्षेत्र में विधान सभा, विधायक, मंत्री व अधिकारी हांस्टल बन रहे हैं, सचिवालय की स्वीकृति भी सरकार ने दी है। लेकिन इस विधान सभा, सचिवालय का स्टेटस क्या है इस पर सरकार और उसके मुखिया मौन हैं। 2 नवम्बर से विधान सभा सत्र आहूत हो रहा है। यह गैरसैंण में होने वाला दूसरा सत्र होगा। पहला गत वर्ष 9 जून से राइका मैदान में टेंट लगा कर सम्पन्न हुआ था। इस बार राजकीय पांलीटेक्निक में आहूत होगा और विधायकों आवास भी टेंट बजाय भराडीसैंण में बन रहे विधायक आवासों में ही होना है।
   सवाल वही है, गैरसैंण में दो सत्र आयोजन के बाद भी यदि सवाल और स्थितियां वही हों तो  पूरी कवायद व्यर्थ ही है। यदि हम आज भी दो राजधानियों के कांसेप्ट में जी रहे हैं तो राज्य आन्दोलन के साथ धोखा कर रहे हैं। हम बाबा मोहन उत्तराखण्डी के गुनाहगार होंगे जिन्होंने 13 बार के आन्दोलन के साथ शहादत दे दी। हम उन मां-बहिनों के भी अपराधी होगे जिनकी अस्मिता उत्तराखण्ड की मांग के लिए खण्डित हुई और उस आन्दोलन की आत्मा गैरसैंण थी।
   सवाल गैरसैंण में विधान सभा या सचिवालय बना देने तक का नही है। मध्य हिमालय का उत्तराखण्ड आपदा और सामरिक  दृष्टि से बहुत संवेदनशील है। वहां अत्यधिक निर्माणों की इजाजत नहीें दी जा सकती। भराडीसैंण  दूधातोली के निकट है, दूधातोली गैर ग्लेश्यिरी 5 नदियों के उद्गम की पर्वत श्रंृखला है जिनमें पश्चिमी रामगंगा भी है और वह उत्तराखण्ड के साथ उप्र में भी जलापूर्ति करती है। पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र में बिना नियोजन के भारी निर्माण प्रकृति को कुपित करेंगे।
   सरकार ने गैरसैंण अवस्थापना विकास परिषद की स्थापना तो की है लेकिन एक साल में बजट आवंटन से आगे उसका काम नहीं बढा है। नीति और नियोजन के मुद्दे पर वह सिफर है। गैरसैंण को कैसे बडे भार से मुक्ति के साथ उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी बनाया जा सकता है इसका सोच पक्ष-विपक्ष के पास नही है। आंध्र प्रदेश एक साल में राजधानी अमरावती की नींव रख देता है तो उत्तराखण्ड 15 साल में भी राजधानी पर सहमति नही बना सकता। पंजाब और हरियाणा का तो और बूरा हाल है दोनों अपनी स्थापना  से ही चंडीगढ डटे हुए हैं। उत्तर- दक्षिण में शायद यही बडा अंतर है।     
               पुरूषोत्तम असनोडा  

बुधवार, 18 नवंबर 2015


     बदरीश धाम के कपाट शीतकाल केलिए हुए बन्द
      गैरसैंण, 17 नवम्बर 2015
भारत के चार धामों में प्रमुख धाम उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थित करोडों हिन्दुओं के आस्था का प्रतीक प्रसिद्ध धाम बदरीनाथ के कपाट 17 नवम्बर को अपरान्ह 4.35 बजे पर पूजा अर्चना व विधि विधान के साथ शीतकाल में श्रृद्धालुओं के लिए बन्द कर दिये गये। इस अवसर पर बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों ने कपाट बन्द होने से पूर्व भगवान बदरीविशाल के दर्शन किये। मन्दिर को गेंदे के फूलों से सजाया गया।
   प्रातः पूर्व परम्परा के अनुसार रावल द्वारा स्त्रीवेश धारण कर लक्ष्मी जी की मूर्ति को मन्दिर के गर्भ गृह में प्रतिस्थापित किया गया तथा कुबेर जी व उद्धव जी के विग्रह मन्दिर से बाहर लाये गये। उसके बाद भगवान का अभिषेक व फूलों से श्रृंगार कर पूजा प्रारम्भ की गई। 4.15 बजे आम श्रृद्धालुओं द्वारा भगवान के दर्शन किये गये। श्रृद्धालुओं द्वारा इस परिदृश्य का आनन्द लिया गया।
बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने के समय की धार्मिक प्रक्रिया व अन्य विधि विधान जितना आकर्षण व कौतुहल लिये होता है कपाट बन्द होने की प्रक्रिया भी उतनी ही अद्भुत होती है। इस परम्परा का निर्वहन करते हुये उन्हें रोना भी पडता है जबकि लक्ष्मी जी के गर्भगृह में प्रवेश करने के साथ ही उद्धव भगवान को भी गर्भगृह से बाहर लाकर चाॅदी की डोली में बिठाया जाता है। इस बीच बदरीविशाल से फूलों का श्रृंगार उतारकर उनकी मूर्ति पर घी मला जाता है।
अनादिकाल से प्राचीन परम्परा के अनुसार माणा गाॅव के मोल्लफा जनजाति के कुंवारी कन्याओ द्वारा अपने हाथों से बनाया गया घृत कम्बल भगवान बदरीविशाल को चढाया जाता है, जो शीतकाल के बाद कपाट खुलने पर ही उतारा जाता है। मान्यता है कि शीतकाल मंे भगवान जनकल्याण के लिये तपस्यारत हो जाते हैं। शीतकाल में छः माह भगवान की पूजा नारद जी द्वारा की जाती है। माॅ लक्ष्मी के गर्भगृह में प्रवेश करने तथा उद्धव जी के गर्भगृह से बाहर निकलने के बाद मन्दिर के कपाट बन्द कर दिये जाते है। कपाट खुलने तक कुबेर व उद्धव भगवान की पूजा अर्चना पाण्डुकेश्वर तथा शंकराचार्य की गद्दी तथा बदरीनाथ की पूजा जोशीमठ नृसिंह मन्दिर में की जाती है। इस धाम के कपाट खुलने का मुहूर्त बसंत पंचमी के पर्व पर महाराजा टिहरी के राजदरबार में की जाती है। तथा कपाट बन्द होने की तिथि दशहरे के पर्व पर बद्रीनाथ मंे घोषित की जाती है। इस अवसर पर लगभग साढे सात हजार श्रृद्धालुओं ने दर्शन किये। श्रद्धालुओं द्वारा भजन कीर्तन व गढ़वाल स्काउट ने बैण्ड की धुन से पूरा बदरीनाथ धाम गुंजायमान रहा। इस मौके पर अध्यक्ष बद्री केदार मन्दिर समिति गणेश गोदियाल, विधायक कपकोट ललित फस्र्वाण, मुख्य कार्याधिकारी मन्दिर समिति बी0डी0सिंह, जिलाधिकारी विनोद कुमार सुमन, पुलिस अधीक्षक सुनील कुमार मीणा, उपजिलाधिकारी जोशीमठ शैलेन्द्र नेगी, पुलिस उपाधीक्षक बी एस रावत, मन्दिर कमेटी के पदाधिकारी आदि मौजूद थे।

                                           



उत्तराखण्डियों की एकता जिन्दावाद
नैनीताल में आज हुए प्रदर्शन में नैनीसार की जिंदल ग्रुप को हुई भूमि आवंटन को रद्द करने की मांग पर नैनीसार के ग्रामीणों व उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के साथ आन्दोलनकारियों के बडे समूह की भागीदारी उत्साह बर्द्धक है। प्रदर्शन में अस्कोट-आराकोट अभियान के सूत्रधार डा शेखर पाठक, उत्तराखण्ड लोक वाहिनी के राजीव लोचन साह, उत्तराखण्ड जन संस्कृति मंच के जहूर आलम, जीवन चन्द्र, उत्तराखण्ड महिलामंच संयोजक डा उमा भट्ट, तरुण जोशी आदि की उपस्थिति उत्साह जगाने वाली है। उत्तराखण्ड के मुद्दों पर सभी आन्दोलनकारी समूहों को एक होने की नितान्त आवश्यकता है।
15 साल में उत्तराखण्ड ने नेता-नौकरशाह- माफिया त्रिकोण का जो नंगा नाच देखा उसके लिए हमारी असफलताओं का भी कम योगदान नही है। बंटी हुई ताकतें लुटेरों ही मौका देंगी। नैनीसार से ही सही शुरुआत हुई है। नैनीसार आन्दोलन में सीपीआई एमएल के राजा बहुगुणा और पुरुषोत्तम शर्मा भी शिरकत कर चुके हैं।
उत्तराखण्ड को माफिया चंगुल से बचाने और उत्तराखण्ड की अवधारणा को सफल बनाने के लिए एकता के लिए हमें अपने अहं ताक पर रखनेे से परहेज नही करना चाहिए। हमारे अग्रज हमसे अधिक समझ रखते हैं। सादर।
पुरुषोतम असनोड़ा
राज्य आन्दोलन में निष्क्रीय रहे लोग राज्य अवधारणा का मजाक उडा रहे हैं
पुरुषोत्तम असनोड़ा
राज्य की काबिना मंत्री इन्दिरा हृदयेश का देहरादून को ही राजधानी बनाने का बयान राज्य अवधारणा से मेल नही खाता है। 40 साल के विधायी जीवन का दावा करने वाली इंदिरा हृदयेश का उत्तराखण्ड राज्य गठन में कोई योगदान हमारी अल्प बुद्धि में तो नही आ रहा है। हां वे राज्य गठन से दो-ढाई दशक पहले से उप्र की विधान परिषद् में उत्तराखण्ड के शिक्षक निर्वाचन से विधान परिषद् की माननीय सदस्य रही और उत्तराखण्ड राज्य अवधारणाओं और राज्य आन्दोलन के ज्वार में उन जैसे कई माननीयों के योगदान कम से कम हमारी स्मृति में नहीं हैं।
    राज्य गठन के बाद सत्ता किन लोगों के हाथ गयी यह सभी को विदित है। जो लोग उत्तराखण्ड राज्य के समर्थक ही न रहे हों भला उनसे राज्य अवधारणाओं और शहीदों के स्वप्नों, आन्दोलन की भावना की बात कोई मायने नही रखती। 9 नवम्बर 15 को जब उत्तराखण्ड राज्य स्थापना की 15वीं वर्षगांठ मनाई जा रही थी  उनका यह बयान शहीदों की शहादत को झुठलाने जैसा है। जो रही हो ंआशा-अपेक्षा, सपने हम वही करेंगे जो हमें ठीक लगेगा।   
   ठीक है जब सत्ता आपको दी है तो माई बाप तो आप ही हैं ना, जो करेंगे जैसा करेंगे सिर झुकाकर स्वीकार करने के अलावा क्या चारा है? गैरसैंण विधान सभा सत्र दो दिन में क्यों समाप्त हो गया उसकी परतें लगातार खुलने लगी हैं। विधान सभा अध्यक्ष ने कहा- संसद का एपीसोड दोहराने की मंशा विपक्ष की थी। ये तो विपक्ष का हाल था जो गैरसैंण राजधानी पर नियम 310 पर चर्चा चाहता था। सरकार में एक संसदीय कार्य मंत्रालय है और उसकी भारी भरकम मंत्री भी। जब राष्ट्रपति ने कहा विधान सभा कम से कम 100 दिन तो चलनी ही चाहिए आप सब क्यों ताली बजा रहे थे। आपको नही मानना था तो कहते महामहिम आपकी सलाह हमें नही पचती। दो दिन का सत्र कितना मजाक है जनता को छलने और संसाधनों के दुरुपयोग का। संसदीय कार्यमंत्री क्यों रास्ता निकालती, उन्हें गैरसैंण आने में ही परेशानी होती है।
म्ंाशा नही है तो अच्छा है लोग समझे तो हैं, देहरादून का मोह उन सब लोगों को है जो उत्तराखण्ड के दुश्मन थे, कहीं उधमसिंह नगर बचाओ आन्दोलन चला रहे थे तो कोई लखनऊ- दिल्ली की आलीशान कोठियों में आन्दोलन को विफल करने की रणनीति बना रहे थे अथवा कामना कर रहे थे। उत्तराखण्ड के गांधी इन्द्रमणी बडोनी पर पत्थर मारने और मुजफ्फर नगर कांड के अनंतकुमार व बुआसिंह को प्रमोशन देने वाले लोग उत्तराखण्ड के मित्र तो नही हैं। सवाल केवल राजधानी का नहीं है जिस जल-जंगल-जमीन को लेकर औपनिवेशिक सत्ता से लेकर स्वतंत्र भारत की सरकारों से हम लडते रहे उनकी रक्षा का सवाल है, पहाड के गांव अपने राज्य निर्माण के बाद खाली हो गये इससे बडा विनाश क्या होगा?आपदा का विनाश झेले गांवों के लिए जमीन नही है नेकिन जिन्दल के इण्टर नेशनल स्कूल के लिए बिना देरी के भूमि हाजिर है।  जिन लोगों के लिए खटीमा, मसूरी, मुजफ्फर नगर या श्रीयंत्र टापू कांड केवल घडियाली आंसू बहाने के निमित बन जायें वे अपनी लाश पर ही तो उत्तराखण्ड बनवायेंगे और मुख्यमंत्री बन उसकी छाती में मुंग दलेंगे। वही लोग जो शिक्षकों का वोट पा विधान परिषद् में एकछत्र राज कर रहे थे राज्य गठन के बाद शिक्षा में कुछ अभिनव करने के बजाय पी डब्लू डी जैसा मलाईदार विभाग ले बैंठते हैं।
   उत्तराखण्ड उन टुच्चों की जागीर बनने दी गयी यह हमारी असफलता है। राज्य आन्दोलन में दिन रात एक करने के बावजूद  हम राज्य निर्माण के काम से पीछे हट गये। और वे लोग आगे हो गये जिनको राज्य अवधारणाओं, शहीदों के स्व्प्नों और जन अपेक्षाओं से कुछ लेना-देना नही है। सन्1994 का ज्वार अचानक नही आया था। वर्षों से हो रही उपेक्षा और लूट के खिलाफ लोग राज्य से कुछ कम नही के साथ सडकों पर उतर आये थे। आज जब जनता खडी होगी तो लुटेरों के भागने के रास्ते बन्द हो चुके होंगे। इसलिए किसी को भी राज्य अवधारणओं की अनदेखी पर दस बार सोच लेना चाहिए।