शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज अस्वस्थ, कोटेश्वर आश्रम में हो रहा है उपचार


 बदिराश्रम ज्योतिर्पीठ के शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम जी महाराज अस्वस्थ हैं और रुद्र प्रयाग के कोटेश्वर महादेव गाभ्म में उपचार चल रहा है।
  73 वर्षीय विद्वान संत, धर्म के मर्मज्ञ और बदरीकाश्रम ज्योतिर्पीठाधीश्वर माधवाश्रम जी महाराज वेद, धर्म के विद्वान होने के साथ ही जनसरोकारों से जुडे संत हैं।
  उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन, शराबबन्दी आनदोलन और गैरसैंण राजधानी आन्दोलन में प्रत्यक्ष भाागीदारी करते रहे हैं। पिछले दिनों बे्रन हैमरेज के चलते उन्हें पीजीआई चंडीगढ में उपचार दिया गया था, जहां से महाराज जी ने कोटेश्वर आश्रम आने की इच्छा जताई थी।
  महाराज के शिष्य वशिष्ठ जी ने बताया कि महाराज के स्वास्थ में सुधार है और आश्रम में ही चिकित्सक उन्हें पी जीआई के निर्देशों के अनुसार उपचार दे रहै। श्रद्धालु शंकराचार्य महाराज के दर्शनों के लिए बडी संख्या में रोज वहां पहुंच कर स्वास्थ्य लाभ हेतु प्रार्थना कर रहे हैं।
  गैरसैंण से उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी पुरुषोत्तम असनोड़ा, यायावर स्मृति समिति महासचिव डा सी एस भण्डारी व जयसिंह नेगी ने  कोटेश्वर आश्रम में शंकराचार्य महाराज के दर्शन किए और भगवान शंकर से उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना की। 



गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

ओफ! इस गुण्डई की हद है, हवा भी पूछेगी मेरी फिंजा में जहर किसने घोला रौतज्यू!


         नैनीसार में जिन्दल नामक जिस भ्ास्‍मासुर को हरीश रावत उठा कर लाये हैं वह उत्तराखण्ड को तो तबाह करेगा ही , स्वयं हरीश रावत के लिए भी भस्मासुर शावित होगा। नैनीसार में भूमि आवंटन से लेकर उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पी सी तिवारी पर हमला तक और राष्ट्रीय तिरंगे के अपमान से लेकर माओवादी गतिविधियों तक सब कुछ उत्तराखण्ड और कांग्रेस की हरीश रावत सरकार के असफलता के लक्षणहैं।
        सच में तो उत्तराखण्ड उस दिन सुलग जाना चाहिए था जब जिन्दल के गुण्डों ने उत्तराखण्ड के एक प्रखर आन्दोलनकारी पर हाथ उठाया।  फिर उस दिन दिन सुलगता जब स्वतंत्रता सेनानी द्वारा फहराये राष्ट्रीय तिरंगे को उतारने का देशद्रोह हुआ। जिस जिदल की कंटीली चार दिवारी में करंट हो और कोई उसे फांदे जिन्दल के लोग उसे न देखें , ऐसा हो कैसे गया? अपने पाप छुपाने को क्या-क्या तरीके ये लोग अपनायेंगे नही कह सकते?
      रावत साहब! आपसे विनती है उत्तराखण्ड की फिंजा खराब न करें। आप अपने 45-50 साल के उत्तराखण्ड की राजनीति का बार-बार हवाला देते हैं। हम लोग कम से कम 40 साल उत्तराखण्ड के सामाजिक कार्यकर्ता आन्दोलनकारी के रुप में काम कर रहे हैं और हमें भी आपकी राजनीति की जानकारी कुछ न कुछ तो जानकारी रही होगी। आप राजनीति में पाने के लिए आयें हैं, हमने लोगों प्लस-माइनस का कभी ध्यान नही किया। आप अपने को राज्य आन्दोलन से जुडा व्यक्ति कहते हैं, हम आपके राज्य आन्दोलन की भूमिका भी जानते हैं।
      संडे पोस्ट के संपादक अपूर्व जोशी को आपने जो पत्र लिखा है उसमें अपनी गांव की सडक का भी जिक्र है। आप बतायेंगे कि दुभणा बैंड- चमडखान की 3 किमी सडक आपके गांव क्यों गयी? ताडीखेत के पूर्व प्रमुख जीवनसिंह रावत से पूछिए जो दुभणा बैंड- चमडखान के 3 किमी मोटर मार्ग के जी ओ के साक्षी हैं। चूंकि आप सांसद बनते ही सडक अपने गांव ले आये और वह सडक आज तक नही बनी।
  उत्तराखण्ड देवभूमि है और यहां गुण्डों की जरुरत नही है। आप अपने बुढापे में तब मोहनरी सकून रह सकेंगे जब गुण्डे नही होंगे, अन्यथा बुढापा खराब समझिए। जिन्दल के गुण्डों से उत्तराखण्ड का वातावरण खराब मत करिए।  अन्यथा गाड-गधेरे ही नहीं हवा भी पूछेगी- मेरी फिंजा  में जहर किसने घोला रौत ज्यू!      

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016





स्व डा उमाशंकर व भवानीशंकर की पहली पुण्य तिथि
जनपक्षीय पत्रकारिता की चुनौती पर गोष्ठी- सिमट रही जनपक्षीय पत्रकारिता पर जाहिर हुई चिन्ता
भवानी शंकर की प्रतिबद्धता मूल्यों के विकास की पत्रकारिता थी
   रीजनल रिपोर्टर के संपादक द्वय स्व डा उमाशकर थपलियाल व भवानी शंकर  थपलियाल की पहली पुण्य तिथि पर हेमवती नन्दन बहुगुणा केन्द्रीय विश्व विद्यालय बिडला परिसर सभागार में आयेजित विचार गोष्ठी में उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया गया।
   भवानी शंकर स्मृति गु्रप की ओर से आयोजित कार्यक्रम में जनपक्षीय पत्रकसरिता की चुनौती पर बोते हुए मुख्य वक्ता वरिष्ठ स्तंभकार डा भरत झुनझुन ने कहा-वौलिटियरी पावट्र्री के बिना जनपक्ष मजबूत नहीं होगा । उन्होंने कहा-मनु स्मृति का ब्राह्मण, लेनिन की पार्टी कैडर और गांधी जी का लोकसेवक  जनता से की शक्ति थी। डा झाुनझुनवाला ने कहा- हम जनपक्ष सोच लें कोई हमें डिगा नही सकता।
  एनडीटीवी के सुशील बहुगुणा ने कहा-पत्रकारिता के लिए जिस सोचा और समझा की जरुरत होती है वह कम होती जा रही है। हम सत्ता या आम जन में किसके पक्षधर हों ये महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा- विाषम स्थितियों, साधनों की नितान्त कमी के बावजूद भवानी ने रीजनल रीपोर्टर को जो धार दी वह जनपक्षीय पत्रकारिता की मिशाल है।
  नवभारत टाइम्स के चन्द्रभूषण ने पत्रकार के लिए जमीन और खाद की आवश्यकता बताते हुए कहा-आज की पत्रकारिता में जनपक्ष सिकुड रहा है। उन्होंने कहा- भवानी की जगह खाली है और उस जगह के लिए कई भवानी पैदा हो तभी वह पूर्ति हो सकेगी। उन्होंने पत्रकारिता को निजी विचार धारा से अलग कर वासत्विकता लोगों के बीच लाने की आवश्यकता बताई।
    डा एस पी सती ने डा उमाशंकर व भवानी शंकर को याद करते हुए कहा- पत्रकारिता के दो स्तंभों का एक साथ हमसे विदा होना दुखदायी है।ं रीजनल रिपोर्टर के संपादकीय सहयोगी गंगासिह ने कार्यवृत प्रस्तुत करते हुए रीजनल  रिपोर्टर के सरोकारों से साक्षत्कार की थीम बताई। इन्द्रेश मैखुरी के संचालन में हुए कार्यक्रम के  समापन अवसर पर डा अरुण कुकसाल ने रीजनल रीपोर्टर के वैचारिक और आर्थिक प़क्ष को सहयोग हेतु अपील की और पत्रिका दायित्व कुशलता से संभाल रही गंगा असनोड़ा थपलियाल की सराहना की।
  आयोजन टीम के सीताराम बहुगुणा, एल मोहन कोठियाल, डा डी आर पुरोहित, पूर्व पालिकाध्यक्ष कृष्णानन्द मैठानी, वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल, गणेश खुगशाल गणी, मधु झुनझुनवाला, डा सुरेखा डंगवाल, डा आर आर नौटियाल, सुधीर भट्ट, अनूप नौटियाल, प्रो ए आर डंगवाल, डा वी सी नैथानी, नीरज नैथानी, डा सी एस भण्डारी, डा बी डी कुकरेती, साहिबसिंह सजवाण, डा जे एस बिष्ट, अतुल सती, सीमा सती, अंजना भट्ट घिण्डियाल सीना उपाध्याय, रोशन नैलवाल, जगदीश भट्ट,  आदि बडी संख्या में लोग उपस्थित थे ।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

   17 फरवरी 2015 हमेशा दैविव्यमान रहने वाला सूरज काली रोशनी लेकर आयेगा कौन सोच सकता है। नाम से शंकर, घर का नाम शंकर, भगवान शंकर के उपासक और भगवान शंकर का ही दिन शिवरात्रि, हमारे अजीज भवानी शंकर व डाॅ उमाशंकर की चिरविदाई जिनसे श्रीनगर, उत्तराखण्ड और देश-विदेश के उनके परिजनों पर जो प्रतिघात हुआ उसकी आज पहली पुण्यतिथि है।
   डाॅ उमाशंकर थपलियाल पत्रकारिता, साहित्य, खेल और सामाजिक जीवन के वह स्तम्भ थे जिसकी रिक्तता हमेशा महसूस की जायेगी। रीजनल रिर्पोटर के प्रबन्ध सम्पादक, आकाशवाणी के सम्वाददाता, यूएनआई, हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स आॅफ इण्डिया, लोकमत, बिजनौर टाइम्स, देवभूमि सहित दर्जनों संस्थानों से जुडे रहे डाॅ थपलियाल पत्रकारिता के बडे स्तम्भ थे। साहित्य और संस्कृति के पुरोधा और सामाजिक जीवन के अभिन्न अंग हमारे अपने थे।
   रीजनल रिपोर्टर के युवा सम्पादक भवानी शंकर की प्रतिभा ज्ञान और सरोकारों को समझने की क्षमता हम सब से अधिक थी। श्रीनगर में रहते हुए देश दुनिया की खोज, अविष्कार, शिक्षा, राजनीति, इतिहास और भूगोल की जो जानकारी उनके पास होती थी वह शायद ही किसी के पास होती थी। हंसमुख, काम पर उलझे रहने वाले और स्वप्न दृष्टा भवानी का असमय जाना खलता है।
   इस एक साल में रीजनल रिपोर्टर की गुरूत्तर जिम्मेदारी बेटी गंगा व रीजनल रिपोर्टर के सम्पादकीय सहयोगी मित्रों, शुभचिन्तकों, परिजनों, पाठकों व विज्ञापनदाताओं ने जितनी तत्परता से सम्भाली है उन सब का स्नेह, आदर सम्पादक द्वय के प्रति प्रदर्शित होता है। अपने प्रिय भवानी व डाॅ उमाशंकर थपलियाल आप पितर श्रेणी में पंहुच गये हैं। आपकी व आपके द्वारा दिखाये गये मार्ग पर चलने के प्रयास की ही हामी भर सकते हैं।
   आपको श्रद्धासुमन! कोटी-कोटी नमन

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

मुख्यमंत्री जनसंवाद,पारदर्शिता और विकास जैसे जुमलों से जनता को गुमराह कर रहे हैं-प्रभात ध्यानी द्वाराहाट में उपपा कार्यकर्ताओं ने फूंका मुख्यमंत्री का पुतला

गैरसैंण,13 फरवरी
        उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी केन्द्रीय प्रधान महासचिव प्रभात ध्यानी सहित छः   उपपा व सहयोगी संगठन नेताओं को रामनगर में मुख्य मंत्री हरीश रावत के आने से पहले गिरफ्तार करने को उपपा ने सरकार की तानाशाही करार दिया है।  दिन में 1.20 बजे प्रभात ध्यानी केसर राणा, पंकज, ललिता रावत, मनमोहन अग्रवाल व मनीन्द्र सेठी को सी ओ स्वतंत्रकुमार व कोतवाल कैलाश पंवार ने गिरफ्तार कर लिया और शायं 5 बजे कालाढुंगी के एसडीएम अशोक जोशी ने उनकी रिहाई की।
        प्रभात ध्यानी ने बताया कि वे मुख्यमंत्री का विरोध करने की बात नही कर रहे थे बल्कि नैनीसार पर मुख्य मंत्री जो गलत बयानबाजी कर रहे हैं उसका जवाब जरुर लेना चाहते थे। उन्होंने कहा- एक ओर हरीश रावत जनसंवाद जैसा ढोंग कर रहे हैं दूसरी तरफ लोगों को अपनी बात कहने पर पुलिस बल का प्रयोग हो रहा है। जनसंवाद, पारदर्शिता और विकास जैसे जुमले बेकार हो गये हैं।
          उन्होंने कहा- नैनीसार से मुख्यमंत्री की पोल खुल गयी है जहां उन्होंने उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी  अध्यक्ष पर जानलेवा हमले के आरोपियों की गिरफ्तारी रोकने का काम किया है और उल्टे पी सी तिवारी की गिरफ्तारी करवाई है।
       उपपा प्रधान महासचिव ने कहा- जनता सरकार की कारगुजारियों को समझ गयी है इसलिए आज नैनीसार में उनके दायित्वधारियों को जनता के भारी विरोध का सामना करना पडा।
       प्रभात ध्यानी और साथियों की गिरफ्तारी की उत्तराखण्ड के कई स्थानों पर प्रतिक्रिया हूई है, द्वाराहाट में उपपा कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री का पुतला जलाया।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

धन्य हैं हम- मुलायम के भी अपराधी रहे और उत्तराखण्ड के विकास पुरुषों के भी

             उत्तराखण्ड विकास के सोपान चढ नही रहा बल्कि छलांग लगा रहा है, सुनकर अच्छा लगा कि राज्य देश के 10 समृद्ध राज्यों में शामिल है और उसकी विकास दर 13 प्रतिशत से अधिक है। किस किस को बधाई दें इस शानदार उपलब्धि पर समझ नही आ रहा है।
            राज्य के मुख्य मंत्री को तो देनी ही पडेगी। अब वे केन्द्र के सौतेले व्यवहार का रोना नही रोयेगे। विकसित प्रदेश का मुख्यमंत्री छोटी- छोटी सहायता के लिए केन्द्र के आगे हाथ पसारे भी क्यों? अब उन्हें बाजार से उधार भी नही लेना पडेगा क्योंकि विकसित हैं तो संसाधन भी होंगे।
              सबसे बडी बात उत्तराखण्ड की जमीनें माफिया को नही देनी पडेंगी, राज्य का खर्चा चलाने के लिए ही तो वे जिन्दल और उसके गुण्डों का बोझ बदनामी की हद तक झेल रहे थे। अब कर्मचारी शिक्षकों को 3 महिने से वेतन न मिलने की शिकायत नही होनी चाहिए। संविदाकर्मियों को 9 माह और अतिथि शिक्षकों को 6 माह से वेतन नही मिला तो क्या है? तीन महिने पहले सुना था राज्य कर्मियों की तनख्वाह के लिए बाजार से कर्ज लेना पडा है। विकसित राज्य में यह कर्ज और भी कई धन्नासेठ देने को तैयार होंगे। देश में धनखवीसों की कमी कहां है? बधाई तो उन नौकरशाहों को देनी पडेगी जो सरकारी बजट को सूंघने में माहिर हैं, जो आपदा के कफन पर भी हाथ साफ करने से नही चूके और भीषण आपदा के दिनों में चिकन कबाब की डकार ले रहे थे।
            उन महानुभावों को भी बधाई जिनके लिए नये पद सृजित करने पडे जो सरकार चाहे कोई हो सबके प्रिय रहे हों, राज्य को कैसे लूटा जा सकता है, हर फार्मूूला जानते हैं। राज्य की जनता को भी बधाई कि उसने उन पार्टियों पर भरोसा किया जो राज्य अवधारणा से भले ही लगातार दूरी बनायें लेकिन विकास का झंडा जिनके हाथ है। लाल पीली बत्तियों उनकी कृपा की मोहताज हैं। विकास और शिक्षा के  नाम पर अब उन्हें कोई हडकायेगा भी नही। विकसित प्रदेश के निवासियों की सडक ठीक हुए बिना 13 प्रतिशत विकास दर  हो ही नही सकती। सरकारी विद्याालय अब छात्र संख्या के कारण अब बन्द नही होंगे। विकास का गणित जोडते घटाते समय शिक्षा भी तो कही न कही होगी ना? अस्पतालों का पी पी पी मोड ही ठीक है। इण्टर नेशनल स्कूल ही क्यों प्राइमरी स्कूलों को बेच खाने की रीति नीति बन चुकी है, कुछ घपलेबाज हैं जो नैनीसार या मलेथा जैसे प्रकरण उठा देते हैं हल्ला करते हैं और सरकार जो बेच रही होती है उसमें बाधा डालते हैं। सरकार के पास पुलिस है प्रशासन है जेल है सब चलेगा, नीति और रीति बन गयी तो किसकी मजाल है जो टांग अडाये, उसके लिए तो गुण्डे हैं, बाउन्सर हैं नही तो एसडीएम, डीएम, कप्तान और कोतवाल हैं। इतने मुकदमे लगेंगे कि कानून की किताब को कई बार पढना पडेगा।
             धन्य है विकास, धन्य हैं विकास कार्यकर्ता उसके गुण्डे और बाउन्सर, हम तो धन्य धन्य हैं ही मुलायम के भी अपराधी रहे और उत्तराखण्ड  विकास महापुरुषों के भी।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

जैंता इक दिन त आलौ उ दिन य दूनी में, दलाल की दिन पूरे होनेें को है


पुरुषोत्तम असनोड़ां
      अल्मोडा जिला का डीडा नैनीसार  6 महिने पहले तक एक मालूम सा गांव-तोक रातों-रात देश- दुनिया में मसहूर हो गया। अनजान से गांव की जमीन पर माफिया की नजर पडी और सरकार ने युद्ध स्तर पर उसे जिन्दल ग्रुप के हिमांशु इण्टर नेशनल स्कूल के नाम आवंटित कर दिया। 
  सैया भये कोतवाल तो डर काहे का, की तर्ज पर बिना लीज पट्टे के 22 अक्टूबर 15 को मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जन विरोध के बावजूद हिंमांशु इण्टरनेशनल स्कूल का उद्घाटन कर दिया। नैनीसार के ग्रामीणों व उत्तराखण्ड परिवर्तंन पार्टी ने भूमि आवंटन का विरोध करते हुए आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। स्कूल में मुख्य मंत्री के इन्वाॅलमेंट ने प्रशासन को इतना पक्षपाती बना दिया कि उसने भूमि के कब्जे में स्कूल को पूरी छूट दे दी । यहां तक कि कानून व्यवस्था की परवाह किये बिना कि वहां जिन्दल ने किस प्रवृति के लोगों को रखा है पूरी छूट दे दी। ग्रामीणों और बार संघ अल्मोडा द्वारा नैनीसार में जिन्दल के लोगों का वेरीफिकेशन कराये जाने का ज्ञापन बेअसर रहा। 2 नवम्बर 15 को आन्दोलित ग्रामीणों व उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी ने गैरसैंण विधानसभा सत्र के दौरान भूमि आवंटन के विरोध में प्रदर्शन किया और नेता प्रतिपक्ष ने सदन में भी हो हल्ले के बीच नैनीसार भूमि आवंटन का उल्लेख कर सरकार को आरोपित किया। 3 अक्टूबर 15 को सरकार ने सचिव राधा रतूडी व शैलेश बगोली को नैनीसार भूमि आवंटन की जांच सौंपी। लेकिन नैनीसार के ग्रामीणों अथवा परिवर्तन पार्टी के आन्दोलन को सरकार व प्रशासन ने पूरी तरह अनदेखा कर दिया।
   आन्दोलन की अनदेखी पर उपपा अध्यक्ष पीसी तिवारी ने सिविल जज की अदालत से स्टे ले लिया जिसे कोर्ट के मैसेन्जर के साथ पी सी तिवारी व उपपा महिला संगठन की सह संयोजक रेखा धस्माना 23 जनवरी 16 को नैनीसार गये तो जिन्दल के बाउन्सरों ने उन्हें घेर कर पकडा और बूरी तरह पिटाई कर दी। बंधक बनाने, जान लेवा हमले और लूट की तहरीर को तो अल्मोडा प्रशासन पचा गया लेकिन पी सी तिवारी, रेखा धस्माना और 11 अन्य आन्दोलनकारियों को आईपीसी की धारा 147,323,447,504व 506 में अल्मोडा जेल भेज दिया।  शानित भ्ंग में जमानत के बाद 11 आन्दोलनकारी तो रिहा हो गये लेकिन पीसी तिवारी व रेखा धस्माना पर एससी एसटी कानून की धारा 3-1-10 लगा कर जेल से रिहाई नही हो पायी ओर 12 दिन जेल में रहने के बाद सशर्त जमानत पर वे 4 फरवरी को रिहा हुए। 
      नैनीसार के मुद्दे ने उत्तराखण्ड के 15 साल के पन्ने पलट दिये हैं बल्कि 15 साल ही नही उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन और उत्तराखण्ड की परिकल्पना तक के पन्ने भी। उत्तराखण्ड की मांग को पं जवाहरलाल नेहरु की 1939 की उत्तराखण्ड यात्रा से जोडें अथवा सन् 1952 के भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के बम्बई अधिवेशन में सचिव पीसी जोशी के अलग राज्य प्रस्ताव, या फिर 1963 पर्वतीय राज्य परिषद्, उत्तराखण्ड का कांसेप्ट यदि पूरी तरह सामने आया तो तो वह सन् 1974 की अस्कोट-आराकोट यात्रा थी। वन आन्दोलन, विश्वविद्यालय आन्दोलन, उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी उत्तराखण्ड क्रांन्ति दल, पृथक राज्य का आन्दोलन, नशा नही रोजगार दो आन्दोलन, सन् 1994-96 का वह ज्वार और उप्र राज्य पुनर्गठन विधेयक 2000 जिसे संवैधानिक रुप से उत्तराखण्ड भारत संघ का 27 वां राज्य बना। 15 साल के 8 मुख्यमंत्री, 4 सरकारें और मंत्री, विधायक, लाल- नीली बत्ती और उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य।
    वन आन्दोलन से ही देखें तो 15 साल का शासक वर्ग उसमें कही नही था। वह ठेकेदारों का पक्षधर था। अस्कोट- आराकोट के कांसेप्ट बनाने के बजाय वे बाटने में महारत लिए थे, वाहिनी का सदस्य होने की बात एक बार मुख्य मंत्री हरीश रावत ने की थीं लेकिन पिछले 40 सालों वे उसंवा किसी किसी कार्यक्रम अथवा आन्दोलन में तो दिखे नही। उत्तराखण्ड क्रान्ति दल राजनैतिक पार्टी है और कोई कांग्रेसी अथवा भाजपाई उसके साथ किसी आन्दोलन में कैसे हो सकता है? नशा नही रोजगार में माफिया पर किसका बरदहस्त था लोग जानते हैं। अब रहा उत्त्राखण्ड राज्य आन्दोलन 2 अक्टूबर 1994 को मंच हथियाने की होड में कौन लोग शामिल थे और राजेश पाइलट से वार्ता में रातों-रात 58 संगठनों को बनाने में किसका योगदान था, लोग समझते हैं। उत्तराखण्ड के आन्दोलन की शक्तियों का एक इतिहास है। वे लडें हैं। वन आन्दोलन, विश्वविद्यालय आन्दोलन, नशा नही रोजगार दो आन्दोलन, उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन सबके जेल यात्री रहे हैं वे, उत्राखण्ड नही तो कार रैली नही आन्दोलन में खिसियाये प्रशासन ने जिस तरह पी सी और उनके साथियों को पीटे जाने कं बावजूद वह रैली रोक कर दिखाने का नायकत्व ही था।
      नैनीसार केवल एक गांव या तोक नही रह गया है यह प्रतीक हो गया है सत्ता के स्वेच्छाचार का, प्रशासन के लुंज-पुंज होने और आन्दोलनों के दमन का। आप उत्तराखण्ड में भूमाफिया के द्वार नैनीसार से खोल चुके थे आपने कुछ जमीनें और चिन्हित की है जो दूसरे जिन्दलों के लिए होंगी, यह उन जिन्दलों के लिए है जो वन आन्दोलन से लेकर आज तक के आन्दोलनों के अगुवा पी सी तिवारी को जान से मारने की कोशिश करते हैं। ये वे जिन्दल हैं जिनके लिए राष्ट्रध्वज का कोई सम्मान नही है और वे जिन्दल हैं जो सरकार और प्रशासन को जेब में रखते हैं।
  15 सालों में हमने सत्ता उन लोगों को दी जिनका राज्य अवधारणा से कोई संबन्ध नही, जो 15 साल उत्तराखण्ड में राज्य करने के बाद इसे केन्द्र शासित होने में भलाई देखते हैं। उत्तराखण्ड के सिर 26 संशोधनों की गठ्ठर लादने और जल विद्युत परियोजनाओ का एमओयू उत्तराखण्ड के बजाय कम्पनियों के पक्ष करने वाले, मुजफ्फरनगर के अपराधियों को प्रमोशन देने, राज्य आन्दोलनकारियों को उपद्रवी बताने की हद तक जाने वाले लोग-पार्टियां उत्तराखण्ड के हितैषी हो कैसे सकती है? जिन लोगों के सिर उत्तराखण्ड के गांधी इन्द्रमणी बडोनी का सिर फोडने का पाप हो वे कितने ही कुुम्भ नहा लें उनके पाप जाने वाले नही हैं। उत्तराखण्ड के जल-जंगल-जमीन पर कुदृष्टि केदारनाथ के बन्द कपाटों के दर्शन से भी मुक्ति नही देगी।
  जो प्रशासन व सरकार तिरंगे की शान में गुस्ताखी बर्दास्त करे उससे बडा नपुंसक कोई नही है। हमारे जवान सियाचिन में माइनस 41 डिग्री सेलसियस पर जिस तिरंगे की शान-बान के लिए अपना खून सुखा रहे हों और जिस तिरंगे पर करोडों करोड बलिदान हुए हों उसे अपमानित करने वालों को जो प्रशासन नजरअंदाज कर दे वह कम से कम देश व उत्तराखण्ड के काबिल तो नही है।
 जनमत जाग रहा है। 8 फरवरी की अल्मोडा में हुई जबाब दो रैली में पुराने आन्दोलनकारियों के साथ युवा और बडी संख्या में महिलाओं की भागीदारी बता रही है कि अब दलाली के दिन समाप्त होने वाले हैं। जैता इक नि त आलौ उ दिन य दूनी में गिर्दा वह दिन आयेगा जरुर। माफिया की हिमायती सरकार के दिन बूरे होगें।