सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

अल्मोडा में 8 फरवरी की जबाब दो रैली- मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग

             नैनीसार में जिन्दल ग्रुप को भूमि आवंटन, पी सी तिवारी व रेखा धस्माना की गिरफतारी, राष्ट्र ध्वज के अपमान व गुण्डों को गिरफ्तार न करने के खिलाफ अल्मोडा में हुई जबाब दो रैली से अभी -अभी लौटा हूं। उत्तराखण्ड की क्षेत्रीय पार्टियों, जन संगठनों की व्यापक भागीदारी उत्साहवर्द्धक रही। डी एम अल्मोडा मुख्यालय पर उपस्थित  नही थे। और वक्ताओं ने सरकार और प्रशासन को बूरी तरह कठघरे में खडा किया। रैली पूरी तरह सफल रही है।
          आम जनता में नैनीसार के भूमि आवंटन को लेकर असन्तोष है और बातचीत में वह स्पष्ट दिख भी रहा है। ये कहना उचित होगा कि हरीश रावत सरकार नैनीसार मुद्दे पर पूरी तरह घिर चुकी है और मुख्यमंत्री के अपने बयान उनके गले की हड्डी बनते जा रहे हैं। 


















शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारियों के साथ मजाक कर रहे है सरकार और उसके कारकून

          उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारियों के साथ सरकार का मजाक तो है ही उसके कारकून भी अब्बल दर्जे का निकम्मापन दिखा रहे हैं। उत्तराखण्ड हाई कोर्ट को सरकार के वकील नहीं समझा पाये कि किसी भी आन्दोलन में आन्दोलनकारियों पर सच्चे झूठे मुकदमे लगाये बिना हमारा तंत्र मानता नही है। उत्तराखण्ड का आन्दोलन गांधीवाद की मिसाल रहा जहां आन्दोलनकारियों ने अपने सीने पर गोली झेली और मां बहिनों की अस्मिता पर हमले के बावजूद हिंसक नहीं हुए, कई बार इस अहिंसक प्रबृति की तीखी आलोचना भी हुई लेकिन अहिंसा के उस हथियार को उत्तराखण्डी मजबूती से पकडे रहे और राज्य ले लिया। हाई कोर्ट का तोड फोड के आरोपियों को उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन की सुविधा देने के तर्क से सहमत न होना निश्चित रुप से सरकार की पेरवी से जुडा मामला है। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन में एक पक्ष जनता थी तो दूसरी सरकार व उसकी पुलिस, तब भला वह आन्दोलनकारियों की प्रशंसा के पुल बाधती या उन्हें अपराधिक मामलों में आरोपित करती? उसने वही किया जो पुलिस का चरित्र है और शांति भंग से लेकर तोड-फोड, आगजनी जैसी धाराओं में मुकदमे दर्ज होना स्वाभाविक था।  3 नवम्बर 15 गैरसैंण के विधान सभा सत्र में विधान सभा ने उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारियों को 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का विधेयक पारित किया जिस पर राज्यपाल कुण्डली मारकर बैठ गये। और विधेयक कानून नही बन पाया।
        मुख्य मंत्री हरीश रावत ने 31 अगस्त 14 तक आन्दोलनकारियों के आवेदन की तिथि दी थी, कई ने आवेदन किए लेकिन वाह रे जांच अधिकारियो वे मानने को तैयार नहीं कि उत्तराखण्ड के लिए आवेदक भूख हडताल पर भी बैठा है। गैरसैंण क्षेत्र का मामला उदाहरण है। शासन द्वारा तय मानकों के अनुसार पुलिस, एल आई यू का रिपोर्ट, चिकित्सालय का प्रमाण और वे साक्ष्य जिनसे जिलाधिकारी सहमत हों चयन के आधार हैं। अधिकांश में पुलिस सन् 1994 व 1996 की जी डी नष्ट कर चुकी है। उस समय की एल आई यू रिपोर्ट भी उपलब्ध नहीं है,बडी मुश्किल से चिकित्सालय का प्रमाण पत्र मिला अब जांच अधिकारी राजस्व उपनिरीक्षक उसे प्रमाण मानने को ही तैयार नहीं हैं। पाठक स्वयं देखें कि चिकित्साधिक्षक का पत्र क्या अनशनकारियों के आन्दोलनकारी होने को नही प्रमाणित कर रहा है?
       8 फरवरी1996 से गैरसैंण के रामलीला मैदान मेें उत्तराखण्ड राज्य की मांग पर हुए आमरण अनशनकारी और प्राथमिक स्वा कंन्द्र द्वारा उनके स्वास्थ्य परीक्षण और पुलिस द्वारा जबरन उठाये जाने की सूची-
8 फरवरी 1996 आमरण अनशन पर बैठे-गोबिन्दसिंह नेगी,सुरेन्द्रसिंह बिष्ट,खीमसिंह रौथाण,रामेश्वर प्रसाद ढौंडियाल,दिलबर सिंह, जिन्ळें पुलिस ने 16 फरवरी को जबरन उठा कर जिला चिकित्सालय गोपेश्वर में फोर्स फीडिंग  करायी। 16 फरवरी 1996 को गैरसैंण में उत्तराखण्ड विकास के तत्कालीन प्रमुख सचिव सुरेन्द्र सिंह पांगती, कमिश्नर गढवाल (वर्तमान मुख्य सचिव) सुभाष कुमार और जिलाधिकारी चन्द्रसिंह में थे और उन्होंने आन्दोलनकारियों का हाल चाल पूछा था।
      16फरवरी 1996 को आमरण अनशन पर बैठे- पदमपति सिस्र्वाल, धनसिंह बिष्ट, विष्णु दत्त बेंजोला, सालिगराम मनोडी व प्रभाष कुमार, जिन्हें 27 फरवरी 1996 को जबरन उठा जिला चिकित्सालय गोपेश्वर ले जाया गया।
     27 फरवरी 1996 को आमरण अनशन पर बैठे- धूमादेवी, चन्द्रसिंह यायावर, बिक्रम सिंह परोडा, कै हिम्मतसिंह व गंगासिंह, जिन्हें 7 मार्च 1996 को जबरन उठाया गया।
  7 मार्च 1996 को आमरण अनशन पर बैठे-रामीदेवी, बसन्ती देवी, बचनसिंह, सुरेशानन्द सती, प्रतापसिंह व गोविन्दराम ढोंडियाल, जिन्हें 14 मार्च को जबरन उठा प्रा स्वा केन्द्र गैरसैंण में फोर्स फीडिंग कराई गयी।
     14 मार्च 1996 को आमरण अनशन पर बैठे-संग्रामी देवी, नन्दी देवी, देवेश्वरी देवी, बाग सिंह व रामसिंह, जिन्हें 21-22 मार्च को पुलिस प्रशासन द्वारा जवरन उठाया गया।  

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

नवम्बर से मार्च तक हिमाच्छादित रहने वाला उत्तराखण्ड का पामीर बर्फ विहीन

गैरसैंण, 5 फरवरी
उमेश नैलवाल
   नवम्बर से मार्च तक हिमाच्छादित रहने वाला उत्तराखण्ड का पामीर फरवरी के पहले सप्ताह में ही बर्फ विहीन है। सितम्बर के बाद पिछले चार महिनों में 4 सेमी से ज्यादा वर्षा ना होने से हिमपात भी नहीं के बराबर हुआ है। चमोली, पौडी व अल्मोडा तीन जनपदों में फैली दूधातोली श्रृंखला 2000 से 2400 मीटर की ऊंचाई का वन क्षेत्र है जहां से 5 सदानीरा नदियां पश्चिमी रामगंगा, रामगंगा, पश्चिमी एवं पूर्वी नयार, विनौ, आटागाड नदियों का उद्गम स्थल है।
    गैर ग्लेश्यिरी नदियों में पश्चिमी रामगंगा उत्तराखण्ड की सबसे बडी नदी है जो कन्नौज में गंगा से मिलती है। नवंबर से मार्च तक दूधातोली का हिमाच्छादित रहना भू-जल संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान अदा करता है। वहीं इन पांच सदानीरा नदियों को जल प्रवाह भी कराता है। स्थानीय जनता के पेयजल स्रोत भी दुधातोली वन क्षेत्र हैं।
    सूखे का असर जल स्रोत और नदियों के प्रवाह पर पडना निश्चित है वहीं रबी की फसल बरबाद होने से किसानों के चेहरे मुर्झा गये हैं। अब गर्मी में वनाग्नि के खतरे बढ गये हैं जिससे पशुपालन का भी प्रभावित होना लाजमी है।
   उल्लेखनीय है कि दुधातोली में तीनों जनपदों के सैकडों पशुचारक साल के 6 महीने खर्को में दुधातोली में ही निवास करते हैं। अवर्षण से चारे की भी समस्या बने तो आश्चर्य नहीं है।
   सलियाणा के वयोवृद्ध काश्तकार दरवान सिंह कहते हैं “इस बार सूखे ने काश्तकारों की कमर तोड दी है और फसल पूरी तरह बरबाद हो गई है।“

   राजुली देवी गौल कहती हैं कि “फसल पूरी तरह बरबाद हो चुकी है।“

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

उत्तराखण्ड सरकार- निचिन्त ह्वे के से गिनी


        लोक कवि, गायक और उत्तराखण्ड के मर्मज्ञ नरेन्द्रसिंह नेगी की नौछमी नारायण में एकपद है -‘निचिन्त ह्वे के से गिनी----‘ यह सरकार के पदों पर विराजमान महानुभावों की कार्य शैली पर है। दो महिने में प्रदेश की दो हडतालों पर सरकारी गूंगा-बहरापन माननीय उच्च  न्यायालय के फैसले के बाद भी लगता नही टूटा है, हां हडताल पर कोर्ट का चाबुक हडताल तोडने को विवश जरुर कर गया।
          दिसम्बर में एक मरीज को हल्द्वानी के एक प्राइवेट अस्पताल में उनके परिजन लाते हैं और कुछ घंटे में वह मर जाता है, चिकित्सक परिजनों को कोई संतोषजनक जबाब नही दे पाते और वहां तोड फोड और चिकित्सकों की पिटाई हो जाती है। तुरन्त प्राईवेट अस्पताल हडताल कर देते हैं तीन दिन प्राईवेट अस्पतालों की हडताल में सरकारी डाक्टर भी कूद पडते है। और भगवान के बाद किसी मरीज को बचाने की जिम्मेदारी लिए डाक्टरों का गैरजिम्मेदारानापन सामने आता है। मरीजों को देखने के लिए न प्राइवेट अस्पताल होते है और न सरकारी।
         माननीय उच्च न्यायालय में जन हित याचिका पर कोर्ट हडताली डाक्टरों को 20 मिनट में काम पर लौटने का आदेश होता है और  हडताली दुम दबा कर काम पर  लौट आते हैं।
 कोषागार कर्मी सचिवालय के कोषागार कर्मियों के समान ग्रेड-पे देने की मांग पर पिछले 40 दिनों से हडताल पर हैं। कोषागारों पर ताले लटके हैं और वेतनभोगियों, पेंशनरों को वेतन व पेंशन के लाले पडे हैं, स्टाम्प नही मिलने से राजस्व का नुकसान हो रहा है और वित्त काम लगभग ठप्प हो जाता है। ऐसे में एक जनहित याचिका दायर होती है और न्यायालय से 3 दिन में हडताल समाप्त करने के आदेश होता है।
          ये तो रही हडताल और न्यायालय की बात। लेकिन सरकार जिस पर व्यस्था की जिम्मेदारी है एक कान तेल और दूसरे कान में घी डालकर कैसे सो जाती है उसका उदाहरण ये दो हडताल है। निजी चिकित्सालयों में मरीज और उसके परिजनों को इलाज के नाम पर लूटने की छूट यही सरकार देती है, वह चाहे किसी पार्टी की हो। किसी की जायज मांग को सुनना सरकार और उसके भ्रष्ट नौकरशाह अपनी तौहीन समझते हैं गोया वे जनता के सेवक नही शासक हों। आप सचिवालय में जो वेतनमान, ग्रेड पे या दूसरी सुविधायें दे रहे हैं और कर्मियों का क्यों नही मिलना चाहिए?
         महत्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि 40 दिनों में जनता परेशान रही और सरकारी -गैरसरकारी कार्य प्रभावित हुए और सरकार की तन्द्रा टूटी नहीं, राज्यपाल  जो हर छोटी-बडी खबर केन्द्र सरकार को भेजते हैं जनता को होने वाली परेशानी पर सरकार को तलब क्यों नही करते? घोषणाओं और घोटालों की राजनीति का अंत होना चाहिए और जनता को अपनी सोच में बदलाव लाना चाहिए कि सरकार और नौकरशाह हमारे शासक नहीं सेवक है और उन्हें उनकी हद भी बतानी होगी।    
 

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी और महिला नेता रेखा धस्माना सशर्त जेल से रिहा, तिवारी ने हरीश रावत सरकार को उखाड़ फेंकने का किया आह्वान


अल्मोड़ा, ३ फरवरी २०१६:
 उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी और पार्टी की महिला संगठन की केंद्रीय सह-संयोजिका रेखा धस्माना को आज सवेरे अल्मोड़ा जेल से सशर्त जमानत पर रिहा कर दिया गया.
९२-वर्षीय अग्रणी स्वतन्त्रता सेनानी देवेन्द्र सनवाल की अगुवाई में उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं तथा अनेक समर्थकों ने तिवारी और रेखा धस्माना का स्वागत किया.
इस अवसर पर पीसी तिवारी ने अल्मोड़ा जेल गेट पर एकत्रित लोगों को संबोधित करते हुए उत्तराखंड में सत्तारूढ़ हरीश रावत सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया और पूरे प्रदेश में इसके लिए आन्दोलन तेज करने को कहा. उन्होंने साथ ही कहा कि राज्य में जल-जंगल-जमीन और जन के पक्ष में जो नानीसार भूमि बचाओ आन्दोलन चलाया जा रहा है, उसे जीत होने तक जारी रखा जाएगा. ज्ञातव्य है कि हरीश रावत सरकार ने जिंदल ग्रुप की एक सस्था को अवैधानिक और अनैतिक ढंग से ३५३ ग्रामीण भूमि दे दी है और अभी इस जमीन का पट्टा तक जिंदल के पक्ष में नहीं हुआ है और वहां निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है.
ज्ञातव्य है कि ३१ जनवरी २०१६ को हल्द्वानी में आयोजित बैठक में राज्य के विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने नानीसार बचाओ संघर्ष समिति और उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी को समर्थन देते हुए एक संयुक्त संघर्ष समिति का गठन किया है जो अब इस आन्दोलन को चलाएगी. इस संयुक्त संघर्ष समिति में उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी और नानीसार बचाओ संघर्ष समिति के अतिरिक्त यूकेडी, आम आदमी पार्टी, स्वराज अभियान, उत्तराखंड महिला मंच, कार्लोस, आरडीएफ, उत्तराखंड जनविकास पार्टी और अनेक संगठन शामिल हैं.
सुरेश नौटियाल

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

नशा नही रोजगार दो आन्दोलन की 32 वीं वर्षगांठ जो शराब बिकवाता है वह देश का दुश्मन है-


गैरसैंण, 2 फरवरी
           आज के ही दिन अल्मोडा जिला के बसभीडा ग्राम से शराब के विरुद्ध उठी जंग ने उत्तराखण्ड में एक ऐतिहासिक आन्दोलन ‘नशा नही रोजगार दो‘ को जन्म दिया। उत्तराखण्ड में शराब को बुराई  की हद तक घृणा करने वाले समाज  में 6 ठें दशक तक बुराई और आतंक का रुप ले लिया था। सर्वोदयी कार्यकर्ताओं ने विभिन्न स्थानों पर सशक्त आन्दोलन चलाकर नशे का प्रतिकार किया और बाध्य होकर उप्र सरकार को उत्तराखण्ड के पहाडी जिलों में नशाबन्दी लागू करनी पडी।
              नशाबन्दी की तोड शराब माफिया ने तस्करी और आयुर्वेदिक दवाओं के नाम पर सुरा,  संजीवनी सुरा, बायोटांनिक और भी कितने ही नामों से 45 प्रतिशत से अधिक एल्कोहल के जहर खुले आम बेचने प्रारम्भ कर दिए। कहना न होगा कि इन्हें बेचने और बिकवाने वाला माफिया सत्ता के भी दलाल थे।
             दो फरवरी 1984 को बसभीडा में उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी के बैनर तले नशा तंत्र के विरुद्ध आन्दोलन का निर्णय लिया गया जिसमें बडी संख्या में महिलाऐं भी थी। बसभीडा से प्रारम्भ आन्दोलन उत्तराखण्ड के गांव-गांव तक पहुंच गया। आन्दोलन के नारे थे-
                                                  जो शराब पीता है-वह परिवार का दुश्मन है।
                                                      जो शराब बेचता है-वह समाज का दुश्मन है
                                                          जो शराब बिकवाता है-वह समाज का दुश्मन है
            शराब पीने वाले परिवार से दुश्मनी, बेचने वाले समाज से और बिकवाने वाले देश से दुश्मनी करते रहे हैं। आज भी आवकारी को प्रदेश के राजस्व का मुख्य स्रोत मानने वाले लोग अपनी भूमिका तय करें तो अच्छा होगा।
         नशा नही रोजगार दो आन्दोलन के ही एक नायक सरकार की जिन्दल गु्रप के साथ पहाडी जमीन की बन्दरबाट के विरुद्ध आन्दोलन में सरकार और माफिया साजिश के शिकार हो जेल में हैं। उत्तराखण्ड के जल-जंगल-जमीन से लडने वाले नायकों मुकाबला सत्ता के उन दलालों से है जो सातवें दशक में लीसा-लकडी, उसके बाद शराब और अब जमीन के   लिए चुनौती भी है कि आजीवन जनता के लिए लडने वाले लोग और आजीवन सत्ता की  राजनीति का यह मुकाबला जनता के दम पर ही जीता जा सकेगा। जनता की जीत का सिपाही यदि कैद में हो तो जिम्मेदारी बडी हो गयी है, ये महसूसना होगा।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

विकास कार्यकर्ता का विकास तो नही गुण्डे जरुर दिख रहे हैं

विकास कार्यकर्ता का विकास तो नही गुण्डे जरुर दिख रहे हैं
मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने को विकास कार्यकर्ता कह रहे हैं। रविवार को वे रुद्रपुर में वही बातें उसी अंदाज में कह रहे थे जो उनका चिर परिचित अंदाज है जिसमें कोई भी राजनेता अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को दोयम दर्जे का बताने से नही चूकता।
   आपकी बातें सुनते हैं तो लगता है आप बडी शिद्दत से उत्तराखण्ड के विकास में लगे हैं और यदि कहें तो उत्तराखण्ड के विकास पुरुष का श्रेय लेने की होड में आप हैं। आपका विकास शिक्षा- चिकित्सा, सडक-परिवहन, कृषि-बागवानी और यहां तक कि आपकी घोषणाओं के हवाई होने की हद तक कहीं दिख नही रहा है। केदारनाथ में कर्नल कोठियाल और उनकी टीम का परिश्रम आपको बहुत कुछ राहत दे रहा है लेकिन उन परिथतियों की ओर आप नही सोच रहे हैं कि चोरवाडी झील आखिर टूटने के कारण क्या हैं?
    उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जितना दखल बढेगा निश्चित रुप से प्रकृति उतनी ही कुपित होगी। केदारनाथ यात्रा में हैली प्रयोग सीमित के बजाय असीमित करने के प्रयासों का कहीं न कहीं केदारनाथ आपदा से सम्बन्ध निकलता है। विज्ञान के युग में इस पर व्यापक वैज्ञानिक बहस नही हुई है। मानें कि केदारनाथ यात्रा प्रारम्भ करना आपकी सफलता का सफर शुरु करता इसके साथ आपदा के वे घोटाले जो सही मायने में  सामने आये भी नही आपने उन्हें क्लीन चिट दे दी। दो साल पहले की अवर्षण को दैवी आपदा मानते हुए उत्तराखण्ड सरकार ने पहाडों के प्रत्येक काश्तकार को 1500 रु दैवी आपदा का मुवावजा दो तिहाई गांवों में अब भी नही बटा है। यही स्थिति मेरा पेड-मेरा धन, मेरा गांव-मेरी सडक, मेरे बुजर्ग-मेरे तीर्थ और सारी योजनाओं की जो आप बार-बार बखान कर रहे हैं। बजट में धनराशि की व्यस्था के बिना कोई भी योजना हवा में नही लटकेगी तो कहां जायेगी? पीपीपी मोड की असफलता को स्वीकारें अथवा नही ये पूरी तरह फ्राॅड सावित हो चुके हैं। सडक के लिए आपके ही जिले की चैखुटिया-मासी सडक देख लें तो सडकों का एक खाका आपके दिमाग में भी बने।
  वीरपुर लच्छी, नैनीसार में हमने गुंण्डों का आतंक देख लिया, राष्ट्र ध्वज का अपमान भी और खनन रोकने गये वन व प्रशासन के अधिकारियों को कुचलने के प्रयास भी।
    आपने खल्डुवा में कहा- पीसी नैनीसार के नही हैं। यदि नैनीसार के लोग कहेंगे तो जिंदल का आवंटन रद्द कर देंगे। इससे पहले आपने शिक्षा और विकास न चाहने की स्थिति में आवंटन रद्द करने की बात कही थी। अब आप पाॅलिसी भी नैनीसार और जिंदल के बीच ले आये हैं। इतना सारा घालमेल? पहली बात तो आप जिस स्थान के बारे में जितना कुछ कहते हैं क्या आप उन सब जगह के हैं? हम केवल उस स्थान के पैदाइश की बात कर रहे हैं, आप इसलिए बोलते हैं कि आप उस राज्य के मुख्यमंत्री हैं, आपको यह पद संविधान ने दिया है, उसी संविधान ने जिसने हम सब लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। पी सी तिवारी एक क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी के अध्यक्ष होने के नाते वह सब बोलेंगे जिसे वे ठीक समण्ते हैं। सरकार की उन नीतियों, कायों की आलोचना भी जो जनता के हित प्रभावित करती है। उन पर गुण्डे छुडा, जेल में बन्द कर आप दमन के रास्ते पर चल रहे हैं। उत्तराखण्ड में सत्ता के दुरुपयोग की शुरुआत तो बेगुनाहों को माओआदी बताकर हो ही चुकी थी आपके राज में सार्वजनिक जीवन के लोगों पर हमले करा गुण्डाराज की गूंज सुनाई देने लगी है।         ं
    उत्तराखण्ड आन्दोलनों की भूमि है और दमन से घबराकर कोई पीछे नही हटेगा ये शायद चेतन-अवचेतन मन में अवश्य होगा।















विकास कार्यकर्ता का विकास तो नही गुण्डे जरुर दिख रहे हैं
मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने को विकास कार्यकर्ता कह रहे हैं। रविवार को वे रुद्रपुर में वही बातें उसी अंदाज में कह रहे थे जो उनका चिर परिचित अंदाज है जिसमें कोई भी राजनेता अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को दोयम दर्जे का बताने से नही चूकता।
   आपकी बातें सुनते हैं तो लगता है आप बडी शिद्दत से उत्तराखण्ड के विकास में लगे हैं और यदि कहें तो उत्तराखण्ड के विकास पुरुष का श्रेय लेने की होड में आप हैं। आपका विकास शिक्षा- चिकित्सा, सडक-परिवहन, कृषि-बागवानी और यहां तक कि आपकी घोषणाओं के हवाई होने की हद तक कहीं दिख नही रहा है। केदारनाथ में कर्नल कोठियाल और उनकी टीम का परिश्रम आपको बहुत कुछ राहत दे रहा है लेकिन उन परिथतियों की ओर आप नही सोच रहे हैं कि चोरवाडी झील आखिर टूटने के कारण क्या हैं?
    उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जितना दखल बढेगा निश्चित रुप से प्रकृति उतनी ही कुपित होगी। केदारनाथ यात्रा में हैली प्रयोग सीमित के बजाय असीमित करने के प्रयासों का कहीं न कहीं केदारनाथ आपदा से सम्बन्ध निकलता है। विज्ञान के युग में इस पर व्यापक वैज्ञानिक बहस नही हुई है। मानें कि केदारनाथ यात्रा प्रारम्भ करना आपकी सफलता का सफर शुरु करता इसके साथ आपदा के वे घोटाले जो सही मायने में  सामने आये भी नही आपने उन्हें क्लीन चिट दे दी। दो साल पहले की अवर्षण को दैवी आपदा मानते हुए उत्तराखण्ड सरकार ने पहाडों के प्रत्येक काश्तकार को 1500 रु दैवी आपदा का मुवावजा दो तिहाई गांवों में अब भी नही बटा है। यही स्थिति मेरा पेड-मेरा धन, मेरा गांव-मेरी सडक, मेरे बुजर्ग-मेरे तीर्थ और सारी योजनाओं की जो आप बार-बार बखान कर रहे हैं। बजट में धनराशि की व्यस्था के बिना कोई भी योजना हवा में नही लटकेगी तो कहां जायेगी? पीपीपी मोड की असफलता को स्वीकारें अथवा नही ये पूरी तरह फ्राॅड सावित हो चुके हैं। सडक के लिए आपके ही जिले की चैखुटिया-मासी सडक देख लें तो सडकों का एक खाका आपके दिमाग में भी बने।
  वीरपुर लच्छी, नैनीसार में हमने गुंण्डों का आतंक देख लिया, राष्ट्र ध्वज का अपमान भी और खनन रोकने गये वन व प्रशासन के अधिकारियों को कुचलने के प्रयास भी।
    आपने खल्डुवा में कहा- पीसी नैनीसार के नही हैं। यदि नैनीसार के लोग कहेंगे तो जिंदल का आवंटन रद्द कर देंगे। इससे पहले आपने शिक्षा और विकास न चाहने की स्थिति में आवंटन रद्द करने की बात कही थी। अब आप पाॅलिसी भी नैनीसार और जिंदल के बीच ले आये हैं। इतना सारा घालमेल? पहली बात तो आप जिस स्थान के बारे में जितना कुछ कहते हैं क्या आप उन सब जगह के हैं? हम केवल उस स्थान के पैदाइश की बात कर रहे हैं, आप इसलिए बोलते हैं कि आप उस राज्य के मुख्यमंत्री हैं, आपको यह पद संविधान ने दिया है, उसी संविधान ने जिसने हम सब लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। पी सी तिवारी एक क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी के अध्यक्ष होने के नाते वह सब बोलेंगे जिसे वे ठीक समण्ते हैं। सरकार की उन नीतियों, कायों की आलोचना भी जो जनता के हित प्रभावित करती है। उन पर गुण्डे छुडा, जेल में बन्द कर आप दमन के रास्ते पर चल रहे हैं। उत्तराखण्ड में सत्ता के दुरुपयोग की शुरुआत तो बेगुनाहों को माओआदी बताकर हो ही चुकी थी आपके राज में सार्वजनिक जीवन के लोगों पर हमले करा गुण्डाराज की गूंज सुनाई देने लगी है।         ं
    उत्तराखण्ड आन्दोलनों की भूमि है और दमन से घबराकर कोई पीछे नही हटेगा ये शायद चेतन-अवचेतन मन में अवश्य होगा।





         मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने को विकास कार्यकर्ता कह रहे हैं। रविवार को वे रुद्रपुर में वही बातें उसी अंदाज में कह रहे थे जो उनका चिर परिचित अंदाज है जिसमें कोई भी राजनेता अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को दोयम दर्जे का बताने से नही चूकता।
         आपकी बातें सुनते हैं तो लगता है आप बडी शिद्दत से उत्तराखण्ड के विकास में लगे हैं और यदि कहें तो उत्तराखण्ड के विकास पुरुष का श्रेय लेने की होड में आप हैं। आपका विकास शिक्षा- चिकित्सा, सडक-परिवहन, कृषि-बागवानी और यहां तक कि आपकी घोषणाओं के हवाई होने की हद तक कहीं दिख नही रहा है। केदारनाथ में कर्नल कोठियाल और उनकी टीम का परिश्रम आपको बहुत कुछ राहत दे रहा है लेकिन उन परिथतियों की ओर आप नही सोच रहे हैं कि चोरवाडी झील आखिर टूटने के कारण क्या हैं?
        उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जितना दखल बढेगा निश्चित रुप से प्रकृति उतनी ही कुपित होगी। केदारनाथ यात्रा में हैली प्रयोग सीमित के बजाय असीमित करने के प्रयासों का कहीं न कहीं केदारनाथ आपदा से सम्बन्ध निकलता है। विज्ञान के युग में इस पर व्यापक वैज्ञानिक बहस नही हुई है। मानें कि केदारनाथ यात्रा प्रारम्भ करना आपकी सफलता का सफर शुरु करता इसके साथ आपदा के वे घोटाले जो सही मायने में  सामने आये भी नही आपने उन्हें क्लीन चिट दे दी। दो साल पहले की अवर्षण को दैवी आपदा मानते हुए उत्तराखण्ड सरकार ने पहाडों के प्रत्येक काश्तकार को 1500 रु दैवी आपदा का मुवावजा दो तिहाई गांवों में अब भी नही बटा है। यही स्थिति मेरा पेड-मेरा धन, मेरा गांव-मेरी सडक, मेरे बुजर्ग-मेरे तीर्थ और सारी योजनाओं की जो आप बार-बार बखान कर रहे हैं। बजट में धनराशि की व्यस्था के बिना कोई भी योजना हवा में नही लटकेगी तो कहां जायेगी? पीपीपी मोड की असफलता को स्वीकारें अथवा नही ये पूरी तरह फ्राॅड सावित हो चुके हैं। सडक के लिए आपके ही जिले की चैखुटिया-मासी सडक देख लें तो सडकों का एक खाका आपके दिमाग में भी बने।
         वीरपुर लच्छी, नैनीसार में हमने गुंण्डों का आतंक देख लिया, राष्ट्र ध्वज का अपमान भी और खनन रोकने गये वन व प्रशासन के अधिकारियों को कुचलने के प्रयास भी।
          आपने खल्डुवा में कहा- पीसी नैनीसार के नही हैं। यदि नैनीसार के लोग कहेंगे तो जिंदल का आवंटन रद्द कर देंगे। इससे पहले आपने शिक्षा और विकास न चाहने की स्थिति में आवंटन रद्द करने की बात कही थी। अब आप पाॅलिसी भी नैनीसार और जिंदल के बीच ले आये हैं। इतना सारा घालमेल? पहली बात तो आप जिस स्थान के बारे में जितना कुछ कहते हैं क्या आप उन सब जगह के हैं? हम केवल उस स्थान के पैदाइश की बात कर रहे हैं, आप इसलिए बोलते हैं कि आप उस राज्य के मुख्यमंत्री हैं, आपको यह पद संविधान ने दिया है, उसी संविधान ने जिसने हम सब लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। पी सी तिवारी एक क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी के अध्यक्ष होने के नाते वह सब बोलेंगे जिसे वे ठीक समण्ते हैं। सरकार की उन नीतियों, कायों की आलोचना भी जो जनता के हित प्रभावित करती है। उन पर गुण्डे छुडा, जेल में बन्द कर आप दमन के रास्ते पर चल रहे हैं। उत्तराखण्ड में सत्ता के दुरुपयोग की शुरुआत तो बेगुनाहों को माओआदी बताकर हो ही चुकी थी आपके राज में सार्वजनिक जीवन के लोगों पर हमले करा गुण्डाराज की गूंज सुनाई देने लगी है।         ं
       उत्तराखण्ड आन्दोलनों की भूमि है और दमन से घबराकर कोई पीछे नही हटेगा ये शायद चेतन-अवचेतन मन में अवश्य होगा।